Friday, 30 December 2011

ग़लती मेरी नज़र की थी

आएगा नया साल तो जाएगा गया साल
फिर उठ के खड़े होंगे कुछ और नए सवाल

या उम्र  बढ़ेगी    या  घटेंगे  ज़िंदगी के दिन
अब जाने किस इरादे से आएगा  नया साल
   
तू  मेरे लिए रूक न सका  सिर्फ दो घड़ी
तब दिल में क्यूँ रुका है अब भी तेरा ख़याल

आँखों में आ के बस गयी है क्यूँ तेरी तस्वीर
ग़लती मेरी नज़र की  थी या था तेरा जमाल

शमा बुझती है




तेरे बुलाने पे आये थे तेरी बज़्म में हम
नहीं पसंद तुझे ग़र तो चलो चलते हैं

नहीं बजता है हर घड़ी  यहाँ  राग बहार
वक़्त के साथ ज़माने के सुर बदलते हैं

बंदिशें इतनी हैं दुनियाँ की फिर भी
राहे उल्फत
में  अरमान क्यूँ मचलते है



फितरतें हैं छिपीं शब के इन अंधेरों में
शमा बुझती है  बेशुमार  बदन  जलते  हैं



Monday, 26 December 2011

ज़िंदा है प्यार

अभी कल ही तो यहाँ आया था चमन पे शबाब
कैसा तारी था हर एक कली पे निखार

वक्ते रूखसत  है तो ख़ुद देख अपनी आँखों से
पत्ते पत्ते सी किस तरहा बिखरी है बहार

ये तेरा हुस्न भी एक दिन तो  बिखर जाएगा
रूह बेदाग़  बना  तू अपनी ज़ुल्फें न संवार

हर एक शम्मा अपनी उम्र ले के आती  है 
बदन तो रोज़ यहाँ  मरते   हैं ज़िंदा है प्यार

सच को पानी में छुपाता क्या है

सच को पानी में छुपाता क्या है
उसका रंग और निखर आएगा

अभी तो दिन है ,चेहरे पहचान
वरना फिर रात में पछतायेगा

तेरी ज़ुल्फों का ये रंगे ख़िज़ाब
ओस की बूंद में घुल जाएगा

मैं तो लुटता रहा हूँ सदियों से
तू मुझे लूट के क्या पायेगा

Sunday, 25 December 2011

आयेगी कब बहार

होता  है शर्मसार क्यूँ ग़र  प्यार किया है
चलता है ज़माना भी इसी प्यार के दम से

मुड़ के न देख पीछे बहुत दूर है मंज़िल   
तय  होगा फासला न  तेरे चार क़दम से

उजड़े हुए चमन  में आयेगी कब बहार
आ कर के पूछती है सबा  रोज़ ये हमसे

थे लोग बहुत फिर क्यूँ नज़र तुझ पे जा रुकी
शायद  है कोई रिश्ता मेरा पिछले जनम से 

Saturday, 24 December 2011

बहकते हैं क़दम



नहीं मिलती हैं मंजिलें अक्सर
उलझी राहों में बहकते हैं क़दम

दिन है तो साथ हैं हज़ारों का
डूबती शाम  कितने तनहा हम

मुझको बस इतनी इजाज़त दे दे
तेरे ज़ख्मों पे रख सकूँ मरहम

साथ बस कुछ  ही  दौलतें हैं मेरी
एक तेरा ग़म और ज़माने के सितम

हमने देखी है  यारब तेरी दरियादिली
ज़िन्दगी दी भी तो वो इतनी कम  



Friday, 23 December 2011

तू मेरे साथ चले न चले


हमें तो बंदगी की आदत है
तेरी मर्ज़ी सलाम ले या न ले

मेरा चलना बहुत ज़रूरी है
तू  मेरे साथ  चले न चले

हँसता चेहरा लगा के जीते हैं
जिनके सीने में कई दर्द पले

टूटे शीशों से हाथ कटते हैं
क्यूँ भला उनका ख़रीदार मिले


ये काली रात बहुत लम्बी है
कोई चराग़  कितनी देर जले

Wednesday, 21 December 2011

शब बहुत अँधेरी थी


यूँ समझिये कि ख़ुदकुशी कर ली
कटे थे पंख हवाओं से दोस्ती कर ली

न थे चराग़ और शब बहुत अँधेरी थी
दिल जलाकर के रोशनी  कर ली

इस तरफ आते हैं वो लौट कर नहीं जाते
ये है बदनाम मोहब्बत की गली

उतर के आयी तेरे गेसुओं से सांवली शाम
लजाती धूप पी के घर को चली


Wednesday, 7 December 2011

दे अब्र या ज़हर दे

तेरे दर को चूम लेंगे , मालिक ऐ दो जहाँ
भूखों का पेट भर दे , रहने को एक घर दे

कितनों के लिए सिर्फ एक छत है आसमान
उघड़े हुए बदन को एक छोटी सी चादर दे

घर की कुआरी बेटी के हाथ पीले कर दे
माँ बहन की कलाई , हरी चूड़ियों से भर दे

बस इतना मांगते हैं , अहले चमन ये तुझसे
इतने दिए हैं कांटे , कुछ गुल भी तो इधर दे

सागर ने रूह कर दी है, अब तेरे हवाले
मर्ज़ी है तेरी बादल , दे अब्र या ज़हर दे
 

Thursday, 1 December 2011

वो रात ज़लज़ले की

अब  जिल्द चढ़ चुकी है  क़िताबे ज़िंदगी पे
हम पीछे देखते हैं पन्ने पलट पलट के
दरिया ने कहाँ रोका था मिलने के रास्तों को
क्यूँ मिल न सके हम तुम जब दोनों एक तरफ़ थे

तुम मुझ पे लगाते हो तोहमत क्यूँ सरे महफ़िल
क्या मैं ही सब ग़लत था या तुम भी कुछ ग़लत थे

थी इंतिहा ऐ उल्फ़त वो रात ज़लज़ले की
सब लोग मर चुके हैं हम इससे बेख़बर थे 
मत छेड़ अब तू मुझसे  मेरी दास्ताने माज़ी
आ आ के सतायेंगे वो क़िस्से उम्र भर के
थोड़ी सी और मोहलत यारब मुझे भी दे दे   
करते हैं प्यार मुझसे कुछ लोग इस शहर के    
   
 


 

Tuesday, 29 November 2011

महमान इस ज़मीन के

महमान इस ज़मीन के  वापस चले गए
सामान तो
बहुत था पर  कुछ न ले गए
वीरान न हो जाए कहीं शहर ऐ मोहब्बत
दिल में हज़ारों दर्द बसा कर  चले गए
बंदगी का मिल ही गया हमको ये  सिला      
उनके  हमारे  दरमियाँ  थे  फासले गए 
मेरा वफ़ा की बात तो उनको न रही याद
औरों की   दास्तान  सुनाते  चले गए

ज़ंजीरें पिघलती हैं


कभी तुम थे अभी मैं हूँ  कोई कल और यहाँ होगा
समय एक आईना  है जिसमें तस्वीरें बदलती हैं

ज़रा सी पी के दीवाने क्यूँ तू इतना बहकता है
सितारे थोडा सा बहकें  तो तक़दीरें बदलती है

सफ़र में ज़िंदगी के  गर जो  कितना भी
अँधेरा हो 
तेरे कामों की परछाईं हमेशा साथ चलती हैं

तुझे क्यूँ खौफ है इतना क़फ़स के सख्त पहरों से
ज़माना करवटें बदले तो ज़ंजीरें पिघलती हैं

Monday, 28 November 2011

वक़्त मुझसे जीत गया

उम्र भर कल कभी नहीं आया
कोई उसे लाओ

लमहे बीते या मैं ही बीत गया
मुझे समझाओ

मैं जिया वक़्त मुझसे जीत गया
क्यूँ हुआ बतलाओ

दर्द सीने में बन गया पत्थर
इसे पिघलाओ

और क्या होना है मुक़द्दर में
तुम  देखते जाओ

Sunday, 27 November 2011

रोशनी बन के चले जाओ

अपने पैरों की ही हिम्मत पे भरोसा रक्खो
कोई सहारे नहीं बनते खाक़सारों के 
अपने रुखसारों की सुर्ख़ी को सम्हाले रखना
इन्हें चुरा के न ले जाएं दिन बहारों के
शमा की ज़िंदगी कितनी है ये है किसको पता
रोशनी बन के चले जाओ बिन सहारों के

मरहले दूर बनाती हैं क़श्तीयाँ भी अलग
नहीं  हैं  साथ कोई ,  डूबते किनारों के

Saturday, 26 November 2011

ये राज़े कायनात

हम कैसे छोड़ पायेंगे आसानी से दुनियाँ
पैरों में जो बंधी हैं मोहब्बत की बेड़ियाँ
राहे अदम को रोके खड़ी है तेरी तस्वीर
अब जाना भी उस पार है एक बड़ा इम्तिहां
किसकी समझ में आये हैं ये राज़े कायनात
हम आते हैं कहाँ से लौट जाते हैं कहाँ
होती जो पास मंज़िल तो हौसला होता
है दूर भी बहुत तेरी ज़मीं से आसमाँ

मुश्किल से सुलझते हैं एक घर के मसाइल
रब कैसे चलाता है एक साथ दो जहाँ

Friday, 25 November 2011

ये उम्र बड़ी है

इन हवाओं को गीत गाने दो,
खिली है धूप मुस्कराने दो
रोने के लिए हमको सारी रात पड़ी है

लफ़्ज़ कल का बस एक धोखा है
जो भी होता है आज होता है
जीना जो अगर आये तो ये उम्र बड़ी है

मेरे ये पैर क्यूँ नहीं रुकते
टूटे शीशे भी क्यूँ नहीं चुभते
लगता है जैसे अब तेरे आने की घड़ी है

रूह तरसेगी  अभी  मत जाओ
आँख बरसेगी कुछ ठहर जाओ
क्यूँ  तुम को लौट कर के  जाने की पडी है

Wednesday, 23 November 2011

अगर बचना न हो


एक काफिला चला है  समंदर में डूबने
ग़ौर से देख लो उसमें कोई अपना न हो
गले लिपट के रो लेना  इस बार सभी से
शायद  तुम्हारा  इस तरफ आना न हो

तमन्ना मौत की जेबों में रहे अच्छा है    
खिडकीयां  खोलना  अगर बचना न हो 
मैंने देखा है दरख्तों  पे लटकी हैं रोटियाँ
मैं चाहता हूँ ये सच हो कोई सपना न हो



तू भी आदम है

समय की आग में हर चीज़ यहाँ जलती है
ख़ाक उड़ती है हवाओं का खिलौना बन कर

ये जागीरें उधार उसकी हैं कुछ दिन के लिए
ज़रा सी देर में रह जायेंगी सपना बन कर

बना के रख ज़मीन पर अपने पैरों की पकड़
रुख़ ये मौसम का बदल जाए न तूफाँ बनकर

मत समझ खुद को फ़रिश्ता कि तू भी आदम है
कभी तो लग जा गले हमसे भी इंसां बन कर

Tuesday, 22 November 2011

नयनों का खारा जल

पाहन बैठे हैं आस लगा , पूछा करते हैं पल प्रति पल
कब अधर हमारे भीगेंगे , नदिया कहती जाती 'कल कल'

क्या करें शिकायत हम तुमसे आवारा सर्द हवाओं की
हमने तो हाथ बढ़ाये थे , ले गयीं छीन तेरा आँचल
 
है शिल्पकार अन्याय तेरा , जीवन में गहरे घाव दिए
फिर उनकी पीड़ा सहने को , क्यूँ हृदय दिया इतना कोमल

मैं रूप तुम्हारा क्यों देखूं , मैं अपनी प्यास बुझा लूँगा
मेरे प्याले में भर देना अपने नयनों का खारा जल

कल ये होगा कल वो होगा , यदि ये न हुआ तो क्या होगा
मत इतना गणित लगाओ तुम, कुल जीवन है केवल दो पल
 

Monday, 21 November 2011

वो पहली मुलाक़ात

कुछ  लोग सोचते थे  उनसे जहान है 
ना जाने कहाँ खो गए मालूम नहीं
जिनके भी हक़ में आया है ये रैन बसेरा
क्यूँ सब दीवाने हो गए मालूम नहीं 

बादल तो आये थे बिना बरसे चले गए
पलकों को कब भिगो गए मालूम नहीं

भूखी ज़मीन रात भर जगती है किस लिए
जब आसमान सो गए  मालूम नहीं
वो पहली मुलाक़ात मुझे याद है मगर
हम कब तुम्हारे हो गए मालूम नहीं
 
 

Saturday, 19 November 2011

गुलशन अभी बर्बाद नहीं


जब तक खुली हैं आँख तभी तक है ज़माना
गर मैं नहीं तो कुछ भी मेरे बाद नहीं है
बीता हुआ सफ़र है  एक ख्व़ाब की तरह
जो भी है याद ठीक से कुछ याद नहीं है
ख़ारों की क़तारों में हैं पोशीदा कुछ गुलाब
गर्दिश में है गुलशन अभी बर्बाद नहीं है
सदियों से यहाँ लोग तो आयें  हैं  मुसलसल
फिर भी न जाने क्यूँ ये घर आबाद नहीं है

अपनी हद में ही तैर  प्यार के समंदर में
कितना गहरा है कहाँ तुझको ये अंदाज़ नहीं है


 


 






Friday, 18 November 2011

सभी राज़ ले गए

वो मांगते हैं वापस  अपनी  अमानतें
कुछ पहले ले गए थे कुछ आज ले गए
जब से चलीं चमन में ये खुश्क हवाएं
पत्ते उड़े शाखों के सभी राज़ ले गए

मैं किस तरह पुकारता जाते हुए उन्हें
रुखसत हुए तो शिद्दते आवाज़ ले गए
नादान  था बचा न सका राज़ों की दौलत
जितने थे राज़ दिल में वो हमराज़ ले गए




Thursday, 17 November 2011

बुरी है रोशनी भी

क्यूँ है इलज़ाम हवा पे कि वो बहती क्यूँ है
यहाँ हर कोई बहता है समय भी आदमी भी

पर्दा गिरता है एक मुख़्तसर किरदार के बाद
यहाँ हर चीज़ बुझती है शमा भी ज़िंदगी भी

जो है हर वक़्त रूबरू उसकी क़ीमत क्या है
चला जाये कोई आके तो खलती है कमी भी

ज़रूरत है चराग़ों की अगर घर में अँधेरा है
जो सोने भी न दे हमको बुरी है रोशनी भी

फ़र्क़ कुछ तो रहे पत्थर में और एक आदमी में
बची रहने दे इन आँखों में थोड़ी सी नमी भी

मेरा हक़ ही नहीं है चाहने की आरज़ू पर
ये है जो प्यार मेरा है मेरी एक बेबसी भी

 
 

Wednesday, 16 November 2011

शब की तारीकी

बाद मुद्दत के मिला तेरा दर
अब ये कहते हो लौट जाएँ हम

ग़म छिपाना हमें नहीं आता
न करो ज़िद कि मुस्कुराएँ हम

और हर बात मान लूँगा मै
मत कहो तुमको भूल जाएं हम
बढ़ती जाती है शब की तारीकी
कितना अब और दिल जलाएं हम
कोई भूले से भी अपना न हुआ
और अब किसको आज़माएँ हम

जी चुके उम्र तेरी दुनियां में
अब कहाँ आशियाँ बनाएं हम 

 
 

Monday, 14 November 2011

इस बहते पानी में

छिपी है दास्ताँ दुनिया से , पर ये भी हक़ीक़त है
मेरी बरबादियों का ज़िक्र है तेरी कहानी में

न जाने लोग कितने रंग चेहरों पर लगाते हैं
सभी घुल घुल के बह जाते हैं उल्फत की रवानी में

ज़रा रफ़्तार कम कर ले तू इन अश्क़ों के दरिया की
नज़र आती नहीं  सूरत तेरी इस  बहते पानी में

हम मांगे  किस तरह तुमसे  कोई एक और नया तोहफ़ा

कि तुमने ग़म दिए इतने मोहब्बत की निशानी में  

Saturday, 12 November 2011

मैं तुम्हे देखा करूँ

जानते   हैं लोग मुझको सब   तुम्हारे  नाम से
और ज़्यादा  खुद को मैं अब किस तरह रुसवा करूँ

ये तुम्हारी  बेरुख़ी  है   और  है    मेरी बेबसी   
तुम   उधर  देखा करो  और मैं  तुम्हे देखा करूँ


प्यार दोनों ने किया है फिर नतीजे क्यूँ अलग

तुम सरे महफ़िल हंसो और तनहा मैं रोया करूँ

मेरा तुमको चाहना  शायद ग़लत था फैसला

मैं किसे चाहूँ ये क्या वाइज़ से मैं पूछा करूँ ?



Friday, 11 November 2011

रब से मिला दे

एक बार कभी मुझको अपने  रब से मिला दे
वो कौन हैं कहाँ है मुझे उसका पता दे

जब दोनों में से कोई उसे जानता नहीं
हम किस पे झगड़ते हैं मुझे इतना बता दे

है हक़ सभी को जीने का ये मेरा सोच है
इस बात की तू चाहे मुझे जितनी सज़ा दे

मैंने तो सारी उम्र की है तुझसे रफ़ाक़त
ये तेरा है ईमान मोहब्बत कर या दग़ा दे 
ये होश  ही तो है सभी दर्दों का समंदर
फिर होश न आये मुझे तू ऐसी पिला दे 

 

Monday, 7 November 2011

तू मुझको जीने दे


अगर   बुझ जाए पूरी तिश्नगी तेरे लबों की
जो बचती है पियाले में मुझे दो घूँट पीने दे

यही मज़हब है मेरा और यही ईमान है मेरा
उधर मैं तुझको जीने दूँ इधर तू मुझको  जीने दे

मेरा भी कुछ तो हक़ है इन बदलते मौसमों पर
झुलसते इस बदन को थोड़े  सावन के महीने दे

सुना है कल मदरसे में मनेगा  जश्ने आज़ादी
न हो तौहीन जलसे में ,  फटी पोशाक सीने दे

है क्यूँ इंसान आमादा तेरी दुनियाँ मिटाने को 
उसे जब ज़िंदगी दी है तो जीने  के क़रीने दे   

Sunday, 6 November 2011

मजबूर की आहें

मानिन्दे झील   गहरी   बेबाक   निगाहें
है कैसे भला  मुमकिन  हम उनको न चाहें

ख़त में तो लिख के भेज दिया है उन्हें सलाम
ये उनका फ़ैसला है उसे कितना सराहें

दरिया का नज़रिया है करता है कितनी क़द्र
साहिल  के पत्थरों ने तो फैला दीं है बाहें

है सब को इंतज़ार कि कब उनके  लब हिलें
किसको सुनाई देती हैं मजबूर की आहें

हमने तो उम्र भर निभाई है वफ़ा की रस्म
मंज़ूर है हमको वो   इसे जितना  निबाहें

हम जिस तरफ़ गए  हैं मिले लोग अजनबी 
तेरे दर पे जो पहुंचा सकें मिलती नहीं राहें

Saturday, 5 November 2011

तिलस्मी शीशा

बेरहम वक़्त तिलस्मी शीशा
कितने जादू हमें दिखाता है
जितना झुक झुक के झाँकता हूँ मैं
मेरा चेहरा ही बदल जाता है

वो देखो दूर एक नन्हा बच्चा
उसके कंधे पे लटकता बस्ता

बंद है जिसमें उसकी माँ का प्यार
एक पराठा और थोड़ा सा अचार


ऐसा लगता है इसे मैं जानता हूँ
कुछ तो इसको भी मैं पहचानता हूँ

ये लो शीशे ने फिर दिया धोखा
ये कोई और नहीं मैं ही था


थोड़ा सा और जब चलूँगा मैं
इसका दस्तूर बदल जाएगा

ये आईना तो रहेगा अपनी जगह
मेरा चेहरा न नज़र आएगा

Friday, 4 November 2011

ढूँढता हूँ वो ही ख़लिश


इस क़दर गर्द से भरी  है माज़ी की क़िताब
इसके पन्नों  को पलटने में भी डर लगता है

कोई ले ले जो तेरा नाम  तो भर आता है जी
दिल पे  अब भी तेरी चाहत का असर लगता है

दो चार  दिन में उतरता नहीं उल्फ़त का नशा
गर जो एक बार हुआ सारी उमर लगता है

हर एक ज़ख्म  में अब ढूँढता हूँ वो ही ख़लिश
दर्द हो सर में भी तो दर्दे जिगर लगता है

पहले रहते थे यहाँ थोड़े बहुत मोहसिन भी
जैसे मक़तल हो शरीफों का, ये शहर लगता है



Tuesday, 1 November 2011

मोहब्बत की तपिश


तुम्हे जो चाहिए कह दो   निकाल कर देंगे दिल से
मांग लो हमसे तुम कुछ भी बस एक अपने सिवा

बड़ी मुश्किल से   कम हुई है मोहब्बत की तपिश
क़मसकम तुम तो न दो फिर बुझी आतिश को हवा

बद दुआ देके  किसी और को  मिलती होगी   राहत
हम फ़क़ीरों की  ज़बां   से  तो   निकलती है दुआ

कुछ तो हमको भी बता दे  कि कहाँ  है तेरा दर
पूछा करती है हर एक  सुबहा   सबा तेरा पता

Monday, 31 October 2011

छू लेंगे आसमां

जब भी उठाई आँख तो हर बार ऐसा लगता रहा
कि छत से हाथ बढ़ाएंगे और छू लेंगे आसमां

उम्र भर कोशिशें नाक़ाम हुई हैं क़रीब आने की
बड़ा कम फ़ासला था तेरे मेरे दिल के दरमियाँ

कहाँ से आज चले आये हैं ये  लोग मेरी महफ़िल में
कल जो रोया तो  किसी दोस्त का कंधा न था यहाँ

ताना मुझे
तुम आज की शिकस्त का  क्यूँ देते हो 
यहीं एक दिन मेरा  ये  दिल भी  हुआ था धुआं धुआं 


 
 

Sunday, 30 October 2011

तेरे एतबार पर

एक दिन उड़ेंगे पत्ते ये शाख होगी खाली 
तेरा इस क़दर भरोसा आयी बहार पर

सच जानता हूँ फिर भी ये मेरी बेबसी है 
मुझे  एतबार क्यूँ  है  तेरे    एतबार पर

शायद  उस ज़लज़ले में ज़िंदा बचा हो कोई
हैं  लोग अभी  ज़िंदा  इसी इंतज़ार  पर

फूलों की महक जैसे एक ख्वाब बन गयी है
साँसों का हक़ बचा है गर्द ओ ग़ुबार पर 

Saturday, 29 October 2011

चलता ये कारवाँ


कितना ग़ाफ़िल है आदमी जो ये सोचता है
दिखाई देती है जितनी है बस यही दुनियां

तेरे हिस्से में तो आये गिने चुने लमहे
हैं इस ज़मीन के नीचे दबी हुईं सदियाँ

छोटी चादर है तो फिर पैर न फैला इतने
ज़रा सी ज़िंदगी के वास्ते कितने अरमां

हर एक पल
है यहाँ नए  इम्तहाँ की तरह
न जाने कब कहाँ  रुक जाए चलता ये कारवां


 

Thursday, 27 October 2011

आने का बहाना

है तुमको ग़र पसंद तमाशा ऐ आतिशी
लो हमने अपने दिल में ख़ुद ही आग लगा ली

कोई तो बने आपके आने का बहाना
हम रोज़ मनाया करेंगे जश्ने दिवाली
पीने को रह गया है बस एक आँख का पानी
कैसे हो मै मयस्सर जब जेब हो ख़ाली

हमको न चैन आएगा न ख्व़ाब आयेंगे 
तुमने हमारी उम्र भर की नींद चुरा ली

Friday, 21 October 2011

रिश्तों के फूल

गुलदस्ते में थे रिश्तों के फूल
वो भी मुरझा गए हैं रात भर में

बचा के रखना अपने अश्क़ों को
बहुत महंगा है पानी इस शहर में

तमाम उम्र वफ़ाओं का सिलसिला
बस एक दीवानगी तेरी नज़र में

दूर मिलते हैं ज़मीं आसमां भी
तुम से हम क्यूँ  न मिले उम्र भर में

है अच्छा दौर तो सब अपने हैं
है अपना कौन एक मुश्किल सफ़र में

न कोई शाख न पत्ते और उजड़ा बदन
कैसे आयेंगे अब फूल इस शजर में







Monday, 17 October 2011

मेरी तक़दीर है

दिले हिन्दोस्तां,हम सब की ये जागीर है
अदब से नाम लो इसका कि ये कश्मीर है

मोहब्बत के फ़रिश्तों ने बनाया है जिसे
मेरे महबूब की एक शोख़ सी तस्वीर है

छोड़ के साथ भला तुम कहाँ जाओगे
पड़ी पैरों में उल्फत की बड़ी ज़ंजीर है

मेहंदी से ढक गयीं हैं हाथों की लक़ीरें
तेरी तक़दीर में पिनहाँ मेरी तक़दीर है

Thursday, 13 October 2011

ढूंढते फिरते हैं रब को

सुकूं मिलना बहुत आसाँ नहीं होता
वक़्त हर वक़्त मेहरबां नहीं होता

जी में आये वो हो सके मुमकिन
कहीं होगा मगर यहाँ नहीं होता

क्या बताएं तेरे तीरों का असर
कहाँ होता है और कहाँ नहीं होता
सुनाएँ  कैसे  दास्ताँ  दिल  की
हमसे तो दर्द भी बयाँ नहीं होता
एक चिनगारी जलाती है शहर
जले जो दिल धुंआ नहीं होता
ढूंढते फिरते हैं रब को जहाँ में लोग
तलाशते हैं वहां वो जहां नहीं होता 




Wednesday, 12 October 2011

गुनाह के प्याले

न वो चाहत न चाहने वाले
कहाँ हैं अब सराहने वाले

जिनको छूने से भी होती है चुभन
हमने ऐसे ही ज़ख्म क्यूँ पाले

मुआफ है गाली ज़ालिम की
शरीफ़ों की ज़बान पर ताले

बिखर गयी है शराफ़त की शराब
भर गए हैं गुनाह के प्याले

हमने मांगी थी एक निगाहे करम
दर्द क्यूँ तूने इतने दे डाले

तू जो कहता है दिखाओ मर के
अब तेरी ज़िद कोई कैसे टाले

Tuesday, 11 October 2011

बुझ गए हैं चिराग़

रोते लोगों की क़तारें खड़ी हैं मेरे दरवाजे पे
क्या कोई आसमानी रूह थक कर सो गई है

उल्फ़त के मजारों पे बुझ गए हैं चराग़
शबे महताब है पर रोशनी कम हो गयी है
...
जाने वाले से मेरा कोई भी रिश्ता न था
फिर भी क्यूँ ये आँख पुरनम हो गई है

दिल में बसती थी एक मखमली आवाज
ऐसा लगता है कि अब वो भी मद्धम हो गई है

Friday, 7 October 2011

पी तू शराबे इश्क़

 
करते हो अगर प्यार तो इज़हार भी करना
कुछ भी नहीं हासिल यूँ ही घुट घुट के जीने में

ये दर्द अगर रो के निकल जाए सही है
ग़र रह गया बन जायेंगे नासूर सीने में

पी तू शराबे इश्क़ कि मयखाना दहल जाए
है क्या मज़ा प्याले से बस दो घूँट पीने में

ये दिल है मेरा बारहा तोड़ा गया शीशा
कट जायेगी उंगली तेरी टुकड़ों को छूने में

Thursday, 6 October 2011

मर जायगा रावण तभी


मरता है केवल आदमी ,मरता नहीं रावण कभी
पत्थर के दिल जलते नहीं ,जलता है एक बेबस का जी

इतने बरसों से जलाते आ रहे हैं जिसको हम

जिस्म बस जलता है उसका रूह ज़िंदा है अभी

भूख से बदहाल रामू किस क़दर माज़ूर है
राम घर आ जायेंगे रामू को दे दो ज़िंदगी

भुखमरी को जीत लो तुम जीत होगी राम की

सच की चादर ओढ़ लो मर पायगा रावण तभी
 

Monday, 3 October 2011

एक तेरी जुस्तजू में

रंगीनियाँ होती हैं बस ख़्वाबों की महफ़िल में
है ज़िंदगी हक़ीक़त एक उलझा रास्ता है

होती नहीं है जिसको दो गज़ ज़मीन हासिल
वो आसमां में अपना एक घर तलाशता है

रखते हैं हमको जिंदा पलकों में सजे सपने
परियों के फ़सानों
का  बचपन से  वास्ता है

थक कर के सो गए हैं सब साथ के मुसाफ़िर
एक तेरी जुस्तजू में क्यूँ दिल ये जागता है

Saturday, 1 October 2011

बदल जायेंगे तेवर

पैरों में बेडी बाँध के कहते हैं  नाचिये 
कैसे अजीब हो गए हैं आज हुक्मरान  

झपकाओगे पलकें तो बदल जायेंगे तेवर
ख़ंजर छुपाये बैठे हैं  ये सारे क़द्रदान
    
जाकर नए बाज़ारों में नफ़रत  खरीदिये
अब बंद हो चुकी हैं  मोहब्बत की सब दुकान

बस बोरिया बिस्तर ही उठाने की देर है 
पहले ही बिक चुका है घर का सभी सामान 



गो भर चुकी क़िताबे दिल

क़ासिद से हम भी करते रहे बेवजह  बहस
तेरी तरफ़ से आया था कोई भी ख़त नहीं
निकला हूँ हो के रुसवा तेरी बज़्म से हर बार
दिल से तुझे निकाल दूं , ऐसी सिफ़त नहीं
बचने के आफ़ताब से साये तो हैं बहुत
नफ़रत की आग रोकती कोई भी छत नहीं
गो भर गए क़िताबे दिल में जाने कितने हर्फ़
एक तेरे नाम का कोई भी दस्तख़त नहीं 

Wednesday, 28 September 2011

आँगन के राज़

आँगन के राज़ रखते हैं ये बंद दरीचे
गुल जानता है कैसे हैं ये बाग़ बग़ीचे

जी चाहता है
सबसे
  चले जाएँ कहीं दूर
है कुछ तो क़शिश तुझ में  जो रखती है  खींचे


इस फ़र्श की टूटी हुई ज़मीन सुधारो
क्यूँ इस पे बिछा डाले हैं ये महंगे ग़लीचे

चलती है बड़े ज़ोर से झूठों की तिजारत
सच डर के छिप गया है अब क़दमों के नीचे

हर चाल जो  चलता था   खोल कर आँखें
पल भर में फ़लक  पहुँच गया पलकें मींचे
 

साँसों का क़र्ज़ था

बाहोश मैं रोया था मेरी बेख़ुदी न थी
नज़रों को झुका लेना मेरी बंदगी न थी

गिरना तेरी गलियों में पहले से ही तय था
उल्फत का रास्ता था जहाँ रोशनी न थी

साँसों का क़र्ज़ था सो चुकाते चले गए
कहने को हम ज़िंदा थे मगर ज़िंदगी न थी

एक चेहरा ढूंढते थे खुली खिडकियों में हम
हमको तेरी तलाश थी आवारगी न थी

Sunday, 25 September 2011

तब भी तो थी दुनियां

जब मैं यहाँ नहीं था तब भी तो थी दुनियां
कल मैं नहीं रहूँगा कोई और तो होगा

मरने से ही बदलेगी खामोश ये फ़िज़ा
मैय्यत पे लोग रोयेंगे कुछ शोर तो होगा

क्या मेरा आना जाना महज़ इत्तेफ़ाक़ था
मेरा मेरे नसीब पे कुछ ज़ोर तो होगा

मुझको नहीं है अपनी तिश्ना लबी का ग़म
कल वो तेरी महफ़िल में सराबोर तो होगा

Friday, 23 September 2011

इमारत क्या बनाएं हम

अँधेरी शब , चराग़ों  में भी थोड़ी रोशनी है कम
कहाँ है वक़्त अब इतना कि तुम रूठो मनाएं हम

ये हम सब चाहते हैं हो हमारे सर पे एक साया
जहां बुनियाद टूटी हो इमारत क्या बनाएं हम

वही जो लोग कहते थे कि मेरा घर बचायेंगे
उन्ही सब ने तो लूटा है किसे अब आज़माएँ हम

यही  मेरा भी  क़िस्सा है  वही तेरी कहानी है
हजारों बार उसको कह के  क्यूँ  आंसू बहायें हम

Wednesday, 21 September 2011

गिरता दरख़्त

गिरता दरख़्त देता है शाखों को तसल्ली
तूफ़ान से मत डरना मैं हूँ तुम्हारे साथ

डूबते एक शख्स ने लोगों को दी आवाज़
ले जाऊँगा उस पार तुम मेरा पकड़ लो हाथ
नस नस पे जिसके आज ज़माने का क़र्ज़ है
निकला है सारे शहर को अब बांटने खैरात

दावत के इंतज़ाम में सब लोग हैं मसरूफ़
अब किस को हम बताएं नहीं आयेगी बारात
 

Saturday, 17 September 2011

नशा माज़ी का है

यादों की झील में आये हैं शराबी झोंके
रक्स करने लगा है अक्स तेरा पानी में

कुछ नए रंग उभर आते हैं मेरे चेहरे पे
ज़िक्र आता है तेरा जब मेरी कहानी में

मुड के   पीछे मैं जो देखूं तो ख़्वाब लगते हैं
जितने रंगीन मनाज़िर थे उस जवानी में

तेरी मखमूर निगाहों के हम हैं मश्कूर
नशा माज़ी का
है हलका सा जिंदगानी में
 

Friday, 16 September 2011

रूप की धूप

रूप की धूप एक दिन तो ढल जायगी
छाँव जीवन के आँगन में पल जायगी
तुम पुकारा करोगे रुको थोड़ी देर
चांदनी मुंह चुरा कर निकल जायेगी

ज़िंदगी को उसी दिन समझ पाओगे
कैसे होती है टूटे बदन में थकन
तुमने जिन पर लुटाये थे अरमां सभी
अब वही लोग देते हें कितनी चुभन

थोड़ी सी दूरियां तो बना कर रखो
कुछ सम्हल कर चलो हर नए मोड़ पर
ख़ुश्क मौसम के आने की आहट सुनो
जाना है पत्तों को डालियाँ छोड़ कर


सहरा की रेत  जैसी है ये  ज़िदगी
इस पे बचते नहीं हैं  क़दम के निशाँ
हश्र उनका भी एक दिन यही धूल है
तुम बना लो यहाँ जितने भी आशियाँ
    
 

 
 

पाँव के छाले

मैंने देखा है तेरी आँखों में गहरा साग़र
मैं तेरा हूँ ,न छुपा मुझसे पाँव के छाले

तू बाँट सकता है अब दर्द अपने सीने का
चले गए हैं सभी रस्म निभाने वाले

कोई कमी न बरत हमको आज़माने में
अभी जिंदा हैं तेरे नाज़ उठाने वाले
सोया  जो एक बार तो जगूंगा नहीं
तुझसे वादा है मेरी नींद उड़ाने वाले
 


Thursday, 15 September 2011

ग़र तमन्ना है



ग़र  तमन्ना है थोड़ी   देर और जीने की
अपने आग़ोश  में भर लो खुली हवाओं को  
 
भिगाती जाएँ  सारी रात  बारिश की ये बूंदे
बना  के रक्खो तुम महमान  इन  घटाओं को

ज़मीं मेरी है उसी से लिपट के रो लूँगा
क्यूँ सुनाऊं मैं दर्द अपना इन फिज़ाओं को

किसे मालूम है क्या लाएगा नया लमहा  
सम्हाले रखना बुरे वक़्त में दुआओं को

Wednesday, 14 September 2011

मौत तय है

ज़िंदा रहना है तो फिर जान रख हथेली पे
मौत तय है जो ख़ुद अपने से डर जाए कोई

ये बात और  है मेरी आँखों में  बहुत पानी में
कितना रोऊंगा अगर शाम को मर जाए कोई

मुझे बता के जो जाए उसे आवाज़ भी दूँ
कैसे रोकूंगा जो चुपचाप गुज़र जाए कोई

तू  कौन  है और क्या है तेरे  घर का निशां
कैसे  ढूंढे   तुझे  ग़र तेरे शहर जाए कोई
एक रहबर भी ज़रूरी है क़ाफ़िले के लिए
ये न  हो  कोई  इधर जाए  उधर जाए कोई

Tuesday, 13 September 2011

शर्मिंदा हूँ


बहुत  पहले ही हो  चुका था दफ़न 
ये क्या कम है कि फिर भी ज़िंदा हूँ


बग़ैर पंख के  परवाज़ की तमन्ना है
कितना माज़ूर हूँ बेबस हूँ एक परिंदा हूँ

न पिला मुझको शिकस्तों की शराब 
अपनी नाकामियों से  पहले ही शर्मिंदा हूँ


बिला वजह न काट देना मुझे ऐ दोस्त
तेरे बदन की मैं ताकत हूँ मैं  रगे जां हूँ

ग़र बचेगी ज़िंदगी

क़ातिलों से भर गयीं हैं बस्तियां    
कितना तनहा हो गया है आदमी

इस अँधेरे में उठा कर अपने हाथ  
किस से मांगें क़र्ज़  थोड़ी रोशनी
 
अपने घर  वापस तभी जा पाओगे
लौटने तक ग़र  बचेगी   ज़िंदगी    

मुफलिसी से  है मेरा  नंगा बदन
लोग कहते हैं   जिसे  आवारगी

आज हम आज़ाद हैं कैसे कहें
अपने घर में हो गए हम अजनबी

जो भी सच बोलेगा मारा जाएगा
क्या यही है तेरी सच्ची रहबरी
गोरा क़ातिल अपने घर वापस गया
अब लहू पीता है काला आदमी

Monday, 12 September 2011

ज़ख्म अब दिल के

ज़ख्म अब दिल के पुराने हो गए हैं
तुम से  बिछुड़े ज़माने हो गए हैं

राहे उल्फ़त पर चले थे साथ मिलकर
अब तो वो  भी फ़साने हो गए हैं

मार कर इंसान को करते इबादत
लोग भी कितने दीवाने हो गए हैं

अब हमें भी मिल गए हैं कुछ नए ग़म
दिल को समझाने के बहाने हो गए हैं

Saturday, 10 September 2011

शामे तनहाई

क्यूँ घबराता है दिल मुश्किल है कितनी शामे तनहाई
वही ये जानता है जिसका घर वीरान होता है

तेरे आँगन में भर जायेंगी कल खुशियाँ ज़माने की
फ़क़त ये बोल भर देना बहुत आसान होता है
सभी रोते हैं दुनियाँ में मुझे ये दो मुझे वो दो
जो मांगे दर्द ग़ैरों का वही इंसान होता है

Sunday, 4 September 2011

और गीत लिखते रहे

किसी की याद जब आये तो नींद क्यूँ आये
खुली थी आँख हमें फिर भी ख्वाब दिखते रहे

छिपा के ज़ेहन में रखते हम भला कितने राज़
उठायी दिल की क़लम और गीत लिखते रहे

थी ख़ाली जेब किसे बेचते अपने आंसू
यही शहर है जहाँ रोज़ प्यार बिकते रहे

आज निकलोगे जो घर से तो साथ हो लेंगे
बस यही सोच के हम तेरे दर पे रुकते र
हे

आज तेरे रूबरू है

लिख जाती है शामें तेरा नाम दिल पर
हर सुबहा तेरे नाम ही से  होती शुरू है

जो दिखता है ज़ेहन की इन खिडकियों से
ज़र्रे ज़र्रे में दुनियां के बस तू ही तू है

क्यूँ डरता है तू  काँटों की चुभन से
जिसे बोया था तूने आज तेरे रूबरू है

मिलेगी ख़ाक में एक दिन ये दौलत
बस तेरे बाद रह जायेगी तेरी आबरू
है
 
 

Saturday, 3 September 2011

एक रहनुमा मिला

एक रहनुमा मिला सफ़र आसान बन गए
कुछ बहके हुए लोग फिर इंसान बन गए

दरवाज़े पे देते थे  बड़ी   देर से  दस्तक
वो प्यार  के रिश्ते मेरा ईमान बन गए

मैं कहता रहा उनसे अपने जिगर का दर्द
वो मेरी हर एक बात पे अनजान बन गए

माँगा  जो हवाओं ने साँसों से थोड़ा  क़र्ज़
जितने बड़े थे कारवाँ  सुनसान  बन गए

Wednesday, 31 August 2011

चढ़ता है आफताब

चढ़ता है आफताब तो झुकती है ये दुनियाँ
तू बन एक ऐसी शाम  हो
जिसका
  एहतराम
भरता जा तू  दिलों में  पैग़ामे मोहब्बत
जब जाए इस जहाँ से
ज़माना करे सलाम 
हक़ीक़त को आंकने के नज़रिए में फ़र्क़ है 
आधा है जो खाली वही आधा भरा है जाम

इस दुनिया ए फ़ानी के हैं अंदाज़ निराले
आने के साथ होता है जाने का इंतज़ाम 
मत  रो ऐ मेरी आँख ,  छिपा ले ये आंसू
ये भीगी हवाएं तुझे कर  डालेंगी बदनाम
 

 

 

Monday, 29 August 2011

एक मजबूर मेमना

तुम ठोंकते रहे मेरे ताबूत में कीलें
मैंने दिखाया आइना तो हो गया गुनाह

कितनी दलीलें देगा एक मजबूर मेमना
उसको तो एक दिन होना ही है तबाह

ये भेड़ियों की नस्ल पनपती ही रहेगी
उनके नुकीले दांत हैं इस बात के गवाह

ये जंगे सियासत के खूंख्वार खिलाड़ी
फिर से करेंगे वार अपनी बदल के राह

Sunday, 28 August 2011

दिल में मेरे अक़ीदत है

ये सच है  मैं मरता हूँ अपने मज़हब पर
राज़ की बात है मज़हब मेरा मोहब्बत है

तेरा जमाल है या मेरी निगाहों का फ़रेब
जिधर भी देखूं नज़र आये तेरी सूरत है

ख़ुद ब ख़ुद झुक ही  जाती है गर्दन मेरी
तेरा चेहरा जैसे कोई  मज़ारे उलफ़त है

है एक फ़र्क़  मुझमें और अहले दुनियां में
वो देखते हैं चेहरा , दिल में मेरे अक़ीदत है 
 

चलो लौट चलें

हम बड़ी दूर चले आये थे अपने घर से
बुला रहा है सारा देश चलो लौट चलें

तेरे ही दूध से बना मेरी रग़ों में खूँ
उतारना है तेरा क़र्ज़ चलो लौट चलें

है अमानत ये शहीदों की मेरी आज़ादी
इसे बचाना मेरा फ़र्ज़ चलो लौट चलें
मिली थी तेरे ही हाथों से ज़िंदगी हमको
लुटा दें तुझ पे क्या है हर्ज़ चलो लौट चलें

Friday, 26 August 2011

एक झुलसा हुआ बदन

वो जां ब लब पड़ा है दीवाने आम में
है भूख से बेहाल एक झुलसा हुआ बदन

दीवाने ख़ास में अभी चलती है ये बहस
किसको मिलेगा बाद में आधा जला क़फ़न
क्या है ये  वही  सुबह जिसे ढूंढते थे हम
राहों से  पूछता  है हर एक राहजन

जन्नत में रो रही  हैं शहीदों की रूहें
है तुझपे पशेमा ये आज़ादी ए वतन

तेरा दिल ग़ुलाम हैं

मैं तो शहर की फ़िक्र में अक्सर नहीं सोता
सुनते है हुक्मराँ की भी नींदें हराम हैं

सुन ग़ौर से क्या कहती है बहती हुई हवा
कहने को तू आज़ाद है तेरा दिल ग़ुलाम हैं

उसने कहा उसे मेरी सेहत का है ख़याल
सच पूछिये तो मौत का सब इंतज़ाम है

माथे की सलवटें नहीं हैं तर्जुमा ए उम्र
वो ही जवां है हसरतें जिसकी जवान हैं

Wednesday, 24 August 2011

सच बचाने के लिए

थे इस फिराक़ में गंगा में हाथ धो लेंगे
आज चढ़ते हुए पानी ने धो दिया चेहरा

चले गए सभी अपनी ही अलग राहों में
सच बचाने के लिए एक भी नहीं ठहरा
इतना आसां नहीं है तैर कर  जाना
है समंदर तेरे अंदाज़ से कहीं गहरा

किसे है फ़िक्र फ़क़ीरों के जीने मरने की
सब चाहते हैं उन ही के सर बंधे सेहरा

Monday, 22 August 2011

संगे देहलीज़ हूँ

मैं कोई मोम के मानिंद नहीं अहले जहाँ
ज़रा सी आग से पिघलूँगा और बह जाऊँगा

जिगर के ख़ून से लिखूंगा तवारीखे वतन
संगे देहलीज़ हूँ दरवाज़े पे रह जाऊँगा

मुझे मिली है तेरे अश्कों से जो इतनी ताक़त
हज़ार ज़ुल्म ज़माने के मैं सह जाऊँगा

हरदम गूंजेगी तेरे ज़ेहन में मेरी आवाज़
प्यार का राज़ तेरे कान में कह जाऊँगा
 

सीने में सजा लो तुम

इन गूंजते नग़मों को सीने में सजा लो तुम
ये इन्क़लाबी मौसम ना आएगा दोबारा
एक आतिशी हसरत को दामन से हवा दो तुम
बुझता हुआ चराग़ भी जल जाएगा दोबारा

समंदर का नज़ारा

बड़ा अजीब है इस बार समंदर का नज़ारा
कश्ती को ढूँढने ख़ुद साहिल निकल पड़ा है

एक बूढ़ी सी चट्टान ने सागर को दी सलाह
कुछ इंतज़ाम कर लो ये तूफ़ान बड़ा है

उठ उठ के पूछती हैं बेचैन सी लहरें
क्यूँ रो दिया जो उम्र भर ग़र्दिश से लड़ा है

साया भी जा छुपा है मेरे पाँव के नीचे
सूरज न जाने कब से मेरे सर पे खड़ा है 
 

Sunday, 21 August 2011

सुन कर मेरी सदायें

मंजिल तो ख़ुद ही चल कर मेरे दर पे आ गयी है
तू छोड़ दे ऐ ज़ालिम यूँ मुझको आज़माना
क्या पायेगा भला तू अब मेरा क़त्ल करके
सुन कर  मेरी सदायें  जब  चल पड़ा ज़माना
शर्मिंदा ही किया   है    हर बार घर पे अपने
मिलना हो अगर तुमको तो मेरे घर ही आना
करते हैं बहस हाक़िम पानी कहाँ से लायें
जब ख़ाक़ हो रहा है जल जल के आशियाना
 
 

Thursday, 18 August 2011

मुझे न रोकना...

किसी शराब का उतरा हुआ ख़ुमार  हूँ मैं
मुझे न रोकना जाती हुई बहार हूँ मैं

यूँ गुज़र जाऊँगा छू कर के तुम्हारे गेसू
तुम्हारे सहन में बहती हुई बयार हूँ मैं

मेरा  नसीब न था तुम भी मेरे हो जाते   
तुम्हारे चाहने वालों में एक शुमार हूँ मैं
कभी तो आओगे तुम भी हमारी बस्ती में
मैं मुंतज़िर अभी ज़िंदा हूँ तलबगार हूँ मैं   
 
 

Tuesday, 16 August 2011

जब बोलता है दर्द

बस थोड़ी दूर जाती है लबों की हरकतें
हर कोई यहाँ अपनी ही ज़बान सुनता है

सूबों में नहीं बटते ये दिल के फैसले
जब बोलता है दर्द हिन्दुस्तान सुनता है

वो क़त्ल कर के दे रहा है अपनी सफाई
ये झूठी दलीलें बस एक नादान सुनता है

बेकार की बहस 
एक वहशी से भी क्यूँ हो
इंसान की बातें बस एक इंसान सुनता है

तेरी समझ न आयेंगे ये रब के इशारे
तारे भी जिसे सुनते हैं जहान सुनता है

Monday, 15 August 2011

क्या सबेरा आएगा ?

भेड़ियों से घिर गया है हिरन
सारा जंगल मौन रह कर देखता है
क्या हिरन बच पायेगा ?

रात के पंजो से घायल किरन
मेरा दिल मुझसे यही अब पूछता है
क्या सबेरा आएगा ?

रह रह के
भीगते हैं  ये नयन
एक गांधी जो कब का मर चुका है
हर रोज़ मारा जाएगा ?

सोच कर डूबता है प्यासा मन
ये काला बादल जो हर घड़ी  गरज़ता है 
क्या बारिशें भी लाएगा ?

Friday, 12 August 2011

करवटें लेता बदन


रात गुमसुम ढल रही है करवटें लेता बदन
अब सुनायी दे रही है दिल की भी आवाज़ कम

बेरहम तनहाइयां ये दे रही हैं मशविरा
तेरी यादों के क़फ़न अब ओढ़ कर सो जाएँ हम

मेरे  माथे  की लकीरों में छिपे  हैं मेरे घाव
मेरी आँखों की नमी में घुल गए हैं मेरे ग़म

तुम भी रोये मैं भी रोया ,थीं  फ़क़त आँखें  जुदा
हमने मिलजुल के उठाये हैं  जुदाई  के सितम
 

Thursday, 11 August 2011

अब सो गया है ये मदहोश शहर

तू है ग़फलत में कोई और बचा लेगा तुझे
जो ख़ुद ही डूब गया ख़ाक संभालेगा तुझे

न देख बिछड़े चमन को अब इतनी हसरत से
कोई नहीं जो वहां फिर से बुला लेगा तुझे

नाख़ुदा डर के कहीं छुप गया है मौजों से
चढ़ते दरिया से भला कौन निकालेगा तुझे

अब सो गया है ये मदहोश शहर तू भी सो
कोई जो रिंद जगेगा तो जगा लेगा तुझे

Wednesday, 10 August 2011

मैंने पूछा बहती बयार से

तनहाइयों को लगा गले हम राहे शौक़ से गुज़र गए
बदनामियों का जिन्हें खौफ़ था वो बीच ही में ठहर गए

सारी उम्र  काली रातों   में  जिन्हें ज़िंदगी की तलाश थी  
खुली  धूप लाई नयी सुबह  तो वो रौशनी से ही डर गए

मैंने पूछा बहती बयार से ,मेरे साथ थे वो किधर गए
मुझे हंस के यूँ बहला गई ,या उधर गए या इधर गए

जो ग़र  इंतिहा ऐ  ज़ुल्म हो , अब कोई  कुछ कहता नहीं
लगता है लोग शहर  के   अपनी मौत से पहले मर गए  

Tuesday, 9 August 2011

अगर हम भूल सकते तो

मेरी दीवानगी का लोग एक क़िस्सा बना लेते
अगर हम तुमको अपने दर्द का हिस्सा बना लेते

बहारों ने बढ़ा दी है नफ़स में इतनी बैचैनी
खिज़ां में टूटते पत्ते भला कब तक हवा देते

नतीजा क्या हुआ है मेरी उस अर्ज़े तमन्ना का
तुम हाँ या ना में अपना कुछ तो फैसला देते

किसे होता है इतना शौक़ अपना जी जलाने का
अगर हम भूल सकते तो तुम्हे कब का भुला देते

हिम्मत से खड़े है

जो शजर सारी उम्र मौसमों से लड़े हैं
अब भी बुलंद हैं उसी हिम्मत से खड़े है

शाखों ने जिनकी रोज़ झुकाए हैं अपने सर
वो टूट कर हवाओं से पैरों में पड़े हैं

रोटी जो अपने हिस्से की औरों में बाँट दें
वो हैं ग़रीब फिर भी अमीरों से बड़े हैं
घायल हैं मेरे पाँव पर दीवानगी देखो
जायेंगे  तेरे गाँव इसी ज़िद पे अड़े हैं
 

Monday, 8 August 2011

कई पैबंद हैं सिलने

कई चेहरे मिले हमसे ,तो क्या हासिल किया दिल ने
तमन्ना जिसकी हमने की , वही आया नहीं मिलने

जिन्हें हम रूह का हिस्सा समझ बैठे थे वो ही गुल
सुना है ग़ैर के गुलशन में , अब जाकर लगे खिलने

सितारों से जड़ी पोशाक को देखा जो हसरत से
तो याद आया कमीज़ों में कई पैबंद हैं  सिलने

मेरी बेबस सी फरियादें , 
तेरा इनक़ार कर देना
ये ही तोहफ़े दिए हैं सिर्फ हमको तेरी  महफ़िल ने

Sunday, 7 August 2011

एक रौशनी की क़ीमत

ग़र मैंने की ख़ताएँ मुझको मुआफ़ कर दे
अब और तेरी दुश्मनी मुझसे नहीं निभेगी

बेनूर ज़िंदगी में रंग की कमी बहुत है
तेरी दोस्ती की चाहत मुझे उम्र भर रहेगी

पूछेगी ज़िन्दगी जब गुनाह उम्र भर के
मैं उससे क्या कहूँगा वो मुझसे क्या कहेगी

एक  रौशनी की क़ीमत दोनों  को  देनी होगी
परवाने भी जलेंगे  और शम्मा भी जलेगी

Saturday, 6 August 2011

सच को बचाए रखना

रुसवाइयां मिलेंगी इन प्यार की राहों में
दुनिया की रवायत है कुछ तो करेगी बात

हम ढूंढते हैं रब को मासूम निगाहों में
क्यूँ फ़िक्र करें उसकी जो दिन को कहे रात

एक  ख्वाहिशे जन्नत से दोज़ख बनी ज़मीं है
मेरे लिए है काफी ग़र तू है मेरे साथ

है जीने की जो हसरत, सच को बचाए रखना

यूँ  ही बनाए रखना हाथों में मेरा हाथ

Friday, 5 August 2011

कैसा है ये प्यार का अंदाज़

आँख से ओझल है जब परवाज़
क्यूँ भला अब दे रहे आवाज़

सर्द साँसों में सहम कर सो गए
मेरी उस दीवानगी के राज़

एक बस मैं ही सहूँ सारे सितम
कैसा है ये प्यार का अंदाज़
रात रोई है बनी  है तब ये शबनम
कितना भीगा सहर का आग़ाज़
तोड़ कर ले जायगा  कल बागवाँ
जिन गुलों पर है चमन को नाज़

हैं सितमगर आज सब गद्दीनशीन
आदमी जीने को है मोहताज

Thursday, 4 August 2011

अक्सर सभी फिसलते हैं

बंजर ज़मीन है जो तेरे पाँव  तले अच्छा है
चमकते फर्श पे अक्सर सभी फिसलते हैं

एक बुरे वक़्त में होती है दिलों की पहचान
जब भी हालात बदलते हैं दिल बदलते हैं
जला के जिसका बदन सब ने घर किया रोशन
वो बुझ गया है तो अब लोग हाथ मलते हैं

निभानी होती है महफ़िल में  रस्म हंसने की
पर हक़ीक़त  है   मेरे दिल में  दर्द पलते हैं

Wednesday, 3 August 2011

बना रख मुझे शरीक़े ग़म

मैंने फैलाए नहीं   हाथ कभी  अपने   लिए
किसी के अश्क़ जो पी लूँ वो मेरी आदत  है

कुछ और  देर  बना रख  मुझे शरीक़े ग़म
ऐसा लगता है कि तुझको  मेरी ज़रुरत है

न  पूछ मुझसे तू मेरे ज़ख्मों का हिसाब

मुझे बता कि तेरे दर्द की क्या हालत है


झुकेगा उम्र भर ये सर तेरे ही दर पे रब
तेरी नज़र जो उठे इस तरफ तो किस्मत  है

एक टुकड़ा तो बचा रखिये अपनी ग़ैरत का
सरे बाज़ार जो बिक जाइए तो लानत है

Tuesday, 2 August 2011

चल आ निकल

चल आ निकल बहती हवा में झूम लें
इस भागते पल को पकड़ कर चूम लें

लिख दें हर दीवार पर अब ये इबारत
ज़िंदगी को ज़िंदा रखती है मोहब्बत

हैं फ़लक की ओर खुलती खिड़कियाँ
जो भी गया तो फिर नहीं लौटा यहाँ

क्या मिलेगा गुमशुदा का ग़म मनाने में
जल चुकी तस्वीर के टुकड़े मिलाने में

Monday, 1 August 2011

है बे आबरू ये रूप

 छिप गया  सूरज तो देखो रो पडी है धूप
ढल गयी  है उम्र अब बे आबरू है रूप

बेरहम  है  वक़्त की चलती  हवा
किसका  दामन भीग जाए क्या पता

ऐसा ही होता है हर एक मर्तबा
ज़िंदगी देती है क्यूँ ऐसी सज़ा

दरमियाँ है नींद का लम्बा सफ़र
कल खुली जो आँख तो होगी सहर

कैसे कर दूँ मैं ये वादा शाम से
जश्न कल होगा मेरे ही नाम से


Sunday, 31 July 2011

थी जिनसे उम्मीदें

निकले थे घर से हम एक इन्सां तलाशने
हमको न जाने कितने ही भगवान मिल गए

जब भी चले जगाने कुछ जीने की हसरतें
दिल के क़रीब मौत के सामान मिल गए

थी जिनसे उम्मीदें न मिली उनसे तसल्ली 
कुछ दर्द बांटने को अनजान मिल गए
सोचा था कुछ मिलेंगे चमनज़ार राह में 
ये देखिये क़िस्मत क़ि बयाबान मिल गए 

Saturday, 30 July 2011

उनको तो शिकायत है

अब यारी कर चुके हैं तारीकीयों से हम
ग़र आये रोशनी तो ख़ुद अपनी गर्ज़ पर

पानी तो आँखों का कब का गया है सूख
और लहू बह रहा है पानी की तर्ज़ पर

तक़लीफे बदन हो तो कोई हो सके इलाज
है चारागर हैरान इस हवस के मर्ज़ पर

अब किस से कहे जाके कोई ज़ुल्म के क़िस्से
उनको तो शिकायत है शिकायत की दर्ज पर

Thursday, 28 July 2011

ज़ख्म बहुत गहरे हैं

नज़र उठा और ख़ुद्दारी बचा के बातें कर
वो नज़र भी क्या जिस पे हज़ार पहरे हैं

हवा परस्त बहे होंगे हवा के रुख़ के साथ
हम जहाँ ठहरे थे अब भी वहीँ पे ठहरे हैं
न दे  सफाई  मुझे   अपनी बेवफ़ाई  की
मेरे सीने में लगे ज़ख्म बहुत  गहरे हैं

नर्म लहज़ों में  छिपा है सब इनका फ़रेब
सफ़ेद   रंगों  से  चमके   सियाह चेहरे हैं 

Tuesday, 26 July 2011

इतना उंचा भी न उड़

इतना उंचा भी न उड़ भूल कर अपनी औक़ात
कि जब गिरे तो ज़मीं पर भी आसरा न मिले

इस बुरी तरहा न ठुकरा तू किसी के जज़बात
कि कल कोई चाहने वाला भी दूसरा न मिले

इसके  टुकड़े यूँ   न कर ये है भरोसे की ज़ंजीर
जो अगर जोड़ना चाहे भी तो सिरा न मिले

कर संभल कर के वो काम कि जिनका अंजाम
ग़र जो अच्छा न मिले कमसकम बुरा न मि
ले