Thursday, 11 August 2011

अब सो गया है ये मदहोश शहर

तू है ग़फलत में कोई और बचा लेगा तुझे
जो ख़ुद ही डूब गया ख़ाक संभालेगा तुझे

न देख बिछड़े चमन को अब इतनी हसरत से
कोई नहीं जो वहां फिर से बुला लेगा तुझे

नाख़ुदा डर के कहीं छुप गया है मौजों से
चढ़ते दरिया से भला कौन निकालेगा तुझे

अब सो गया है ये मदहोश शहर तू भी सो
कोई जो रिंद जगेगा तो जगा लेगा तुझे

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