Chithhi
Sunday, 21 October 2012
तालीम अधूरी है अभी
दफ़्न करना मुझे मदरसे की फुलवारी में
मेरी तालीम अधूरी है अभी
भीड़ है इतनी कि लड़ता है बदन से बदन
दिलों के बीच में दूरी है अभी
तू जानता है डगर फिर भी इन अंधेरों में
एक चराग़ ज़रूरी है अभी
न मिला है न मिलेगा उम्र भर तू शायद
मिलने की आस तो पूरी है अभी
Sunday, 14 October 2012
दिल है एक आईना
सोच कर तोडना दिल है एक आईना
आईने टूट कर फिर से जुड़ते नहीं
गर न हो हौसला मत बढ़ाना क़दम
प्यार के रास्ते पीछे मुड़ते नहीं
जिनको लगता है पागल हवाओं से डर
आंधियों में परिंदे वो उड़ते नहीं
जिनके रिश्तों की बुनियादें मजबूत्त हैं
वो शहर छोड़ने से बिछुड़ते नहीं
Monday, 8 October 2012
ऐ सियाही रात की अब
क़श्ती भी हूँ साहिल भी हूँ
रस्ता भी हूँ मंज़िल हूँ मैं
मोहसिन भी हूँ क़ातिल भी हूँ
आसाँ भी हूँ मुश्किल हूँ मैं
जैसी भी थीं महफ़िलें
वैसे ही पहने है लिबास
मैय्यत में हूँ रोता हुआ
बारात में शामिल हूँ मैं
जी में आता है जला दूँ
दुश्मनों के आशियाँ
क्या करूँ मजबूर हूँ
बच्चे का नन्हा दिल हूँ में
उम्र भर जलने के बाद
पूछता है ये चराग़
ऐ सियाही रात की अब
क्या तेरे काबिल हूँ मैं ?
Sunday, 7 October 2012
देश एक टूटता है
देश एक टूटता है
बटता है सूबों में
सूबों से शहरों में
शहरों से गाँवों में
गाँव से गलियों में
गलियां तब घुसती हैं
घर के गलियारों में
बंद दरवाजों में
खुद को भरे बाहों में
मन के अंधियारों में
एक अकेला आदमीं
.........................
देश दूर छूट गया
बुरी तरह टूट गया
आदमी से आदमी
ईमान मर गया है
आओ सुलगते दिल पर कुछ रोटियाँ पका लें
नीचे कमर से बाढ़ का पानी उतर गया है
वो रोज़ ही करता है इंसानियत का खून
तुम झूठ कह रहे थे क़ातिल सुधर गया है
कौड़ी नहीं मिली है मुफ़लिस को अभी तक
चोरी का माल था जो इधर से उधर गया है
नंगों की नुमाइश में करे किस तरफ निगाहें
ख़ुद शर्मसार होकर ईमान मर गया है
Saturday, 6 October 2012
इतनी सज़ा काफ़ी है
शबनमी बूंदों में आंसू मिला कर पी लिए मैंने
आज दिन भर के लिए इतना नशा काफ़ी है
तेरी यादों में इतने सख्त लमहे जी लिए मैंने
बकाया उम्र के लिए बस इतनी सज़ा काफ़ी है
सुलग रहा है तो वो कल ख़ाक भी हो जाएगा
दिल से जितना भी निकलता है धुआं काफी है
दहशत का दौर है , रात है दरवाज़े बंद रहने दे
इन दरीचों से जितनी आती है हवा काफी
है
Thursday, 4 October 2012
मुझे पता है
मुझे पता है बेवफा है तू
फिर भी मैं तुझसे प्यार करता हूँ
ये मोहब्बत ग़रीब की दौलत
सिर्फ तुझ पे निसार करता हूँ
बड़ी सजा है इस गुनाह की लेकिन
फिर भी मैं बार बार करता हूँ
बिछड़ा था तुझसे जिस दोराहे पर
वहीं खड़ा हूँ तेरा इंतज़ार करता हूँ
प्यार मजबूरी है कोई हक़ तो नहीं
टूटा दिल तार तार करता हूँ
Wednesday, 3 October 2012
ज़िंदगी क्या है
नहीं मिला है कभी दर्दो ग़म
कैसे समझोगे ज़िंदगी क्या है
उम्र गुज़री है गर अंधेरों में
कैसे जानोगे रोशनी क्या है
तलाशते हैं जो रूप की दौलत
वो क्या जानें कि सादगी क्या है
कहाँ से आके कहाँ जाता है
किसने जाना है आदमी क्या है
मेरे मैय्यत में भी वो चुप ही रहा
उसने दिखलाया बेरुखी क्या है
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