Tuesday, 4 December 2012

तूफ़ान उठा रक्खा है



दहकते चेहरे पे लिपटा भीगा आँचल जैसे
किसी बादल ने बिजली को छिपा रक्खा है 



तेरे इनकार के डर से जिसे  मैं दे न सका
ख़त वो इज़हार का कब  से  लिखा रक्खा है

 न टूट जाए कहीं तेरे हसीं रिश्तों का घर
मैंने एक  आग को सीने में दबा रक्खा है
  
तुझे चाहूँ तो ज़माने का क्या बिगड़ता है
दुनिया  ने मुफ्त में तूफ़ान उठा रक्खा है

Monday, 3 December 2012

मेरे ज़ख्म कहाँ है


मिला है दर्द जहां से वो मेरे अपने थे
गैरों को क्या पता था  मेरे ज़ख्म कहाँ है


कल रात इस बस्ती में जलाए गए थे लोग
जो खाली दिख रहे हैं वो सब उनके मकां हैं 



नुमाइश नहीं लगी है सितारों की बदन पे
मेरे सीने पे चमकते तेरे तीरों के निशां हैं  



महफ़िल में मेरा हँसना एक मेरी बेबसी है
रोने के कितने हादिसे इस  दिल में निहां हैं  



Sunday, 2 December 2012

और तेरा तीर है


हर बशर की बस यही तक़दीर है
अपने  घर में कल टंगी तस्वीर है



वक़्त कहता है चलो चलते रहो
और पैरों में बंधी ज़ंजीर है



मुख़्तसर है मेरे ग़म की दास्ताँ
ये जिगर मेरा और तेरा तीर है
 
दफ़्न कल मुमताज़ हुई थी जहां
ताज महल  हो गया तामीर है

क्यूँ जगाते हो उसे सोने भी दो
ज़िंदगी से थक गया राहगीर है 




Saturday, 1 December 2012

कौन लिखता है

बंद आखों में नज़र आते हैं कितने चेहरे
आँख खुलती है कोई भी नहीं दिखता है

ख्वाब 
दुनिया है या ख्वाब में है  ये दुनिया
सब हक़ीक़त है तो ख्वाब में क्या दिखता है

हादिसे होते हैं यहाँ पहले से लिखी होनी से
होनी ये किस तरह होनी है कौन लिखता है

कोई तो रिश्ता है इस आंसू का तेरे चेहरे से

निकल के आँख से रुखसारों पे क्यूँ रुकता है

Friday, 30 November 2012

कोई ख्वाब न देख

मुझसे  मिलना है  मेरी रूह से मिल
मेरे बदन में लिपटा हुआ लिबास न देख

ठीक से जान ले दरिया ये कितना गहरा है
आती जाती हुई लहरों का हिसाब न देख

रक्स करती हुई परियों की  कहानी तो नहीं
 ज़िंदगी  एक हकीकत है  कोई ख्वाब न देख

शर्म से दोहरा हुआ जाता है तेरा महबूब
भरी महफ़िल में  यूँ उसे  बेहिसाब न देख  

Thursday, 29 November 2012

वो आंयें न आयें

बेहतर है दरिया को अपना बना लो
किनारों का क्या जाने कब टूट जाएँ

खुद अपने ही बाजू से दुनिया संभालो
सहारों का क्या जाने कब छूट जायें

तनहा भी जीने की आदत तो डालो
अपनों का क्या जाने कब रूठ जाएँ

मेरे दोस्तों मेरी मैय्यत उठालो
क्या उनका भरोसा वो आंयें न आयें

छलकते हुए पैमाने

हर होठ चाहता है छलकते हुए पैमाने
क्या मोल हैं जहां में एक खाली सुराही का

रोने पे बंदिशें हैं सब कुछ कहो ज़ुबां से
अब ये सिला मिला है अश्क़ों की गवाही का

जो आज हो गया है ऐसा ही तो होना था
एहसास था पहले से मुझे अपनी तबाही का

मेरी नज़र बुरी है सब लोग ये कहते हैं
तोहफा दिया जहां ने ये पाक निगाही का