Wednesday, 14 March 2012
Tuesday, 13 March 2012
आके ज़रा रक्स तो कर
अभी ज़ेहन में बचे हैं कुछ यादों के फूल
सींचते हैं अश्कों से जिनको शामो सहर
उसके अंदाज़े तरन्नुम को बसा लूं दिल में
अभी चलता हूँ तेरे साथ मेरी मौत ठहर
मैं हवा में तेरी पायल की खनक सुनता हूँ
मेरी आँखों में कभी आके ज़रा रक्स तो कर
मेरी आँखों में कभी आके ज़रा रक्स तो कर
जाने कब तक है मेरे साथ ये साँसों का सिलसिला
कुछ बता कर तो हादिसे नहीं होते अक्सर
कुछ बता कर तो हादिसे नहीं होते अक्सर
Sunday, 11 March 2012
किससे अब कहा जाए
मुख्तलिफ़ है ऐ रहबर तेरा अंदाज़े क़त्ल
मौत तो मौत है वो जिस तरह भी आ जाए
जिसको देखो वो ही खंजर लिए है हाथों में
दवा दो ज़ख्म न दो किससे अब कहा जाए
कौन है वाली ओ वारिस यहाँ मजलूमों का तुम्ही बताओ किससे वास्ता रखा जाए
जो भी आया नया हाक़िम उसी ने मारा है
कितने दिन और अब ये सितम सहा जाए
Saturday, 10 March 2012
जलन बढती जाती है
उसी गुलाब में कांटे भी छिपे बैठे हैं
जिस की खुशबू तुझे मदहोश किये जाती है
लोग जो हँसते हुए दिखते हैं इस बस्ती में
उनकी रूहों से सिसकने की सदा आती है
...
हम भी देखेंगे इस बरस ये सावन की हवा
लूटती है हमें या मोतियाँ बरसाती है
ढूंढ के लाओ कोई फिर से नया चारागर
मर्ज़ जाता नहीं है बस दवा बहलाती है
क्या कहें हम तेरी आँखों की शराब
जितना पीते हैं उतनी प्यास बढ़ती जाती है
सभी ने रस्म निभायी है
चढ़ता सैलाब जिन्हें दूर किया करता है
क़श्तियाँ जोड़ती आयी हैं उन किनारों को
सभी ने रस्म निभायी है मुरझाने की
गुलों का क़र्ज़ चुकाना है इन बहारों को
ढलता सूरज हूँ प्यार न कर मुझसे ऐ शाम
कोई आवाज़ नहीं देता टूटे तारों को
रोते हैं सर छिपा कर के अपने दामन में
कोई कंधा नहीं देता है ग़म के मारों को
क़श्तियाँ जोड़ती आयी हैं उन किनारों को
सभी ने रस्म निभायी है मुरझाने की
गुलों का क़र्ज़ चुकाना है इन बहारों को
ढलता सूरज हूँ प्यार न कर मुझसे ऐ शाम
कोई आवाज़ नहीं देता टूटे तारों को
रोते हैं सर छिपा कर के अपने दामन में
कोई कंधा नहीं देता है ग़म के मारों को
Wednesday, 7 March 2012
मिली थी चांदनी
ढल रही है शाम थक कर बुझ गया सारा शहर
अब नहीं लगता है जैसे अब भी कुछ होने को है
करते हैं महफ़िल तेरी तेरे हवाले ऐ ज़मीं
अब नहीं लगता है जैसे अब भी कुछ होने को है
करते हैं महफ़िल तेरी तेरे हवाले ऐ ज़मीं
आख़िरी ये मरहले और ज़िंदगी सोने को है
रंग जितने पत्तियों में भर सकी वो भर चुकी
शाख़ की किस्मत में बाकी क्या सिवा रोने को है
चाँद को सौंपेंगे जो उससे मिली थी चांदनी
साथ लाये थे क्या हम , इस वक़्त जो खोने को है
यहाँ भूखे हैं लोग
झूठे वादे न कर रहबर यहाँ भूखे हैं लोग
ज़िंदगी एक हक़ीक़त है कोई ख्वाब नहीं
कोई बहाना नया फिर से ढूँढ मत साक़ी
कभी पियाला नहीं तो कभी शराब नहीं
ये ढलती उम्र है इतने सवाल करती है
और मेरे पास इनका कोई जवाब नहीं
जीना होगा तुझे ऐ दोस्त इन्ही कांटो में
चमन में बाकी अब एक भी गुलाब नहीं
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