Saturday, 12 November 2011

मैं तुम्हे देखा करूँ

जानते   हैं लोग मुझको सब   तुम्हारे  नाम से
और ज़्यादा  खुद को मैं अब किस तरह रुसवा करूँ

ये तुम्हारी  बेरुख़ी  है   और  है    मेरी बेबसी   
तुम   उधर  देखा करो  और मैं  तुम्हे देखा करूँ


प्यार दोनों ने किया है फिर नतीजे क्यूँ अलग

तुम सरे महफ़िल हंसो और तनहा मैं रोया करूँ

मेरा तुमको चाहना  शायद ग़लत था फैसला

मैं किसे चाहूँ ये क्या वाइज़ से मैं पूछा करूँ ?



Friday, 11 November 2011

रब से मिला दे

एक बार कभी मुझको अपने  रब से मिला दे
वो कौन हैं कहाँ है मुझे उसका पता दे

जब दोनों में से कोई उसे जानता नहीं
हम किस पे झगड़ते हैं मुझे इतना बता दे

है हक़ सभी को जीने का ये मेरा सोच है
इस बात की तू चाहे मुझे जितनी सज़ा दे

मैंने तो सारी उम्र की है तुझसे रफ़ाक़त
ये तेरा है ईमान मोहब्बत कर या दग़ा दे 
ये होश  ही तो है सभी दर्दों का समंदर
फिर होश न आये मुझे तू ऐसी पिला दे 

 

Monday, 7 November 2011

तू मुझको जीने दे


अगर   बुझ जाए पूरी तिश्नगी तेरे लबों की
जो बचती है पियाले में मुझे दो घूँट पीने दे

यही मज़हब है मेरा और यही ईमान है मेरा
उधर मैं तुझको जीने दूँ इधर तू मुझको  जीने दे

मेरा भी कुछ तो हक़ है इन बदलते मौसमों पर
झुलसते इस बदन को थोड़े  सावन के महीने दे

सुना है कल मदरसे में मनेगा  जश्ने आज़ादी
न हो तौहीन जलसे में ,  फटी पोशाक सीने दे

है क्यूँ इंसान आमादा तेरी दुनियाँ मिटाने को 
उसे जब ज़िंदगी दी है तो जीने  के क़रीने दे   

Sunday, 6 November 2011

मजबूर की आहें

मानिन्दे झील   गहरी   बेबाक   निगाहें
है कैसे भला  मुमकिन  हम उनको न चाहें

ख़त में तो लिख के भेज दिया है उन्हें सलाम
ये उनका फ़ैसला है उसे कितना सराहें

दरिया का नज़रिया है करता है कितनी क़द्र
साहिल  के पत्थरों ने तो फैला दीं है बाहें

है सब को इंतज़ार कि कब उनके  लब हिलें
किसको सुनाई देती हैं मजबूर की आहें

हमने तो उम्र भर निभाई है वफ़ा की रस्म
मंज़ूर है हमको वो   इसे जितना  निबाहें

हम जिस तरफ़ गए  हैं मिले लोग अजनबी 
तेरे दर पे जो पहुंचा सकें मिलती नहीं राहें

Saturday, 5 November 2011

तिलस्मी शीशा

बेरहम वक़्त तिलस्मी शीशा
कितने जादू हमें दिखाता है
जितना झुक झुक के झाँकता हूँ मैं
मेरा चेहरा ही बदल जाता है

वो देखो दूर एक नन्हा बच्चा
उसके कंधे पे लटकता बस्ता

बंद है जिसमें उसकी माँ का प्यार
एक पराठा और थोड़ा सा अचार


ऐसा लगता है इसे मैं जानता हूँ
कुछ तो इसको भी मैं पहचानता हूँ

ये लो शीशे ने फिर दिया धोखा
ये कोई और नहीं मैं ही था


थोड़ा सा और जब चलूँगा मैं
इसका दस्तूर बदल जाएगा

ये आईना तो रहेगा अपनी जगह
मेरा चेहरा न नज़र आएगा

Friday, 4 November 2011

ढूँढता हूँ वो ही ख़लिश


इस क़दर गर्द से भरी  है माज़ी की क़िताब
इसके पन्नों  को पलटने में भी डर लगता है

कोई ले ले जो तेरा नाम  तो भर आता है जी
दिल पे  अब भी तेरी चाहत का असर लगता है

दो चार  दिन में उतरता नहीं उल्फ़त का नशा
गर जो एक बार हुआ सारी उमर लगता है

हर एक ज़ख्म  में अब ढूँढता हूँ वो ही ख़लिश
दर्द हो सर में भी तो दर्दे जिगर लगता है

पहले रहते थे यहाँ थोड़े बहुत मोहसिन भी
जैसे मक़तल हो शरीफों का, ये शहर लगता है



Tuesday, 1 November 2011

मोहब्बत की तपिश


तुम्हे जो चाहिए कह दो   निकाल कर देंगे दिल से
मांग लो हमसे तुम कुछ भी बस एक अपने सिवा

बड़ी मुश्किल से   कम हुई है मोहब्बत की तपिश
क़मसकम तुम तो न दो फिर बुझी आतिश को हवा

बद दुआ देके  किसी और को  मिलती होगी   राहत
हम फ़क़ीरों की  ज़बां   से  तो   निकलती है दुआ

कुछ तो हमको भी बता दे  कि कहाँ  है तेरा दर
पूछा करती है हर एक  सुबहा   सबा तेरा पता