Thursday, 22 November 2012

कुछ तुमने भी बदनाम किया

थे पहले से भी ज़ख्म कई फिर तेरी नज़र ने काम किया
कुछ तो हम भी दीवाने  थे कुछ तुमने भी बदनाम किया

वो वस्ल के मंज़र देखे थे बस घर की ही दीवारों ने
मैंने तो लब सी रक्खे थे तुमने ही ये चर्चा आम किया

जो पी कर रोज़ बहकते थे वो रौनके महफ़िल बनते रहे
मैंने तो पिए थे अश्क तेरे क्यूँ मुझको शराबी नाम दिया

छलक जाया करो


तेरा चेहरा  है जामे मय की तरह
कभी हम पर भी छलक जाया करो

 बहुत  अँधेरा है मेरे आँगन में
हो चांदनी  तो चले  आया करो

हमें मंज़ूर है रो लेना  तेरे शानों पे
दूर रह कर न यूँ  रुलाया करो

अब निकलना है तेरी महफ़िल से
वक़्ते रुख़सत   न आज़माया करो

तेरा चेहरा  है जामे मय की तरह
कभी हम पर भी छलक जाया करो

 बहुत  अँधेरा है मेरे आँगन में
हो चांदनी  तो चले  आया करो

हमें मंज़ूर है रो लेना  तेरे शानों पे
दूर रह कर न यूँ  रुलाया करो

अब निकलना है तेरी महफ़िल से
वक़्ते रुख़सत   न आज़माया करो

उदासियों से जो घिर जाए दिल
हम दीवानों की गली आया करो 

Monday, 19 November 2012

डर गया हूँ मैं

मेरे दरवाजे पे लोगों का हुजूम
है इतनी भीड़  डर गया हूँ मैं

दुश्मन भी कर रहे हैं  तारीफ़
ऐसा लगता है  मर गयां हूँ मैं

बदन जितनी ज़मीन मेरी  है 
सो सकूँगा  जिधर गया हूँ मैं 

न मना ग़म मैं एक लमहा था
झपकी पलकें गुज़र गया हूँ मैं  

उनमें एक रूह थी शामिल

मैं बड़े शौक़ से इस दर से चला जाऊंगा
था तेरे पास मेरा दिल मुझे वापस दे दे

जो बिताए थे रो रो के तसव्वुर में तेरे
जवान उम्र के वो दिन मुझे वापस दे दे


आज डूबा हूँ तो समझा हूँ कि साग़र क्या है
मेरी क़श्ती मेरा साहिल मुझे वापस दे दे

तेरी चूनर में बंधे रहते थे जितने सामान

उनमें एक रूह थी शामिल मुझे वापस दे दे

Thursday, 15 November 2012

जिंदा रहूँगा मैं

कोयला नहीं हूँ कि राख हो जाऊँगा
पैदाइशी मशाल हूँ जलता रहूँगा मैं

मैंने तेरे दिल में जगह बना ली है
बाद मरने के भी जिंदा रहूँगा मैं

Monday, 12 November 2012

कोई ईश्वर तो मिले

थाल दीपों का सज गया लेकिन 
किसे पूजें कोई ईश्वर तो मिले

डूब जायेंगे बड़े शौक़ से हम भी
रंग और रूप का सागर तो मिले

किसने माँगा है रेशम का लिबास
लाज ढकने को  चादर तो मिले

हम तलाश आये हैं कितने पर्वत
कहीं ईमान का पत्थर तो मिले 

मेरा आशियाँ जलाने को


तू परेशान न हो मेरी इन खुशियों से रक़ीब
दोस्त कुछ कम तो नहीं आशियाँ जलाने को

उन्हें आता है बना रखना शराफत का भरम
खाक़ जब हो गया घर आये हैं बुझाने को

कोई गर और जो करता तो शिकायत करते  
दर्द अपनों ने दिया क्या कहें ज़माने को

जानकर तुमसे बहुत दूर चले आये हम
क्या करें यादों का आतीं हैं जी जलाने को