Wednesday, 26 September 2012

लिखते लिखते

है आज भी दिल में तेरी  रुसवाइयों का डर
कलम रुक रही  है तेरा नाम लिखते लिखते

पूजा है मैंने उम्र भर  कुछ  तुझको इस क़दर
नज़र झुक रही है तेरा नाम लिखते लिखते

बिकता  रहा सामान सब और मैं था बेखबर
एक बाकी बच गया है ईमान बिकते बिकते

बड़ी दूर तक जमाये रहा उस पे मैं नज़र
गुम हो गया  अचानक  वो शख्स दिखते दिखते

ये मेरा शहर नहीं

हो जाएँ बंद जब भी साँसों के सिलसिले
बाद उसके मेरे नाम की कोई सहर नहीं

क्यूँ पूछते हो बारहा मेरे शहर का नाम
मैं जिस में रह रहा हूँ ये मेरा शहर नहीं

धू धू सा जल उठेगा एक तेरी बेरुखी से
तिनकों का आशियाँ है पत्थर का घर नहीं

गर तोड़ने थे तुझको फिर क्यूँ बनाए रिश्ते  

 इन्हें फिर से जोड़ने को बाक़ी उमर नहीं 

Tuesday, 25 September 2012

आदमी एक आदमी से जलता है


वक़्त के साथ यहाँ हर बशर पिघलता है
कोई होता है दफ़न और कोई जलता है

नहीं जुदा है ये  शाह ओ मुफ़लिस के लिए
जोड़ इस ज़िंदगी का शून्य ही निकलता है

अलग नहीं है तेरे  और मेरे ग़मों की तादाद
क्यूँ फिर आदमी एक आदमी से जलता है


ये बात और है बदलते रहते हैं क़िरदार
तमाशा ज़िंदगी का उसी तरह चलता है
 

Sunday, 16 September 2012

कोई नया हादिसा



न झांकिए बेवजह दरीचों से
कोई नया हादिसा होता न दिखे

साथ महफ़िल में हंस रहा था वही
लिपटा दीवारों से रोता न दिखे



हमें था रश्क जिसकी खुशियों से
दर्द के बोझ को ढोता न दिखे

हमसे कहता था जागते रहना
मौत की नींद में सोता न दिखे
............

न झांकिए बेवजह दरीचों से
वो किसी और का घर है

आप डर जाएँगे देखने के बाद
मुझको इस बात का डर है

प्यार का अंजाम हूँ मैं


 साहिल की  ठुकराई  एक लहर की तरह
चलो बुरा ही सही प्यार का अंजाम  हूँ मैं

कुछ तो हासिल हुआ है मुझको तेरी शोहरत से
अहले दुनिया में तेरे नाम से बदनाम
हूँ मैं 

लोग कहते हैं मुझसे तुमसे भी कहते होंगे
उनके कहने के लिए बाइसे इलज़ाम
हूँ मैं

इन्ही वीरानों में कभी मय के दौर चलते थे
उन्ही मयखानों का टूटा हुआ एक जाम  हूँ  मैं 


मुझे ठोकर न लगा मैं भी तेरी नस्ल  से हूँ
उगती एक सहर है तू  डूबती एक शाम हूँ मैं 

Saturday, 15 September 2012

आँख का पानी

गया है सूख हम सब की आँख का पानी
फ़लक में ढूँढिये बादल कि जिसमें पानी हो
मैं थक गया हूँ ऐ रहबर फ़रेबी वादों से
सुना वो बात कि जिसमें नयी कहानी हो

Sunday, 9 September 2012

मेरे माज़ी के छिपे दाग़



तेरे दरवाजे पे ले आई हवा आज हमें
कल बहेगी ये जिस ओर  उधर जायेंगे


न हटा गर्द मेरी ज़िंदगी की परतों से
मेरे माज़ी के छिपे दाग़ उभर आयेंगे

तेरे रुखसारों के मानिंद सुर्ख़ ज़ख्म मेरे
वक़्त मरहम है एक दिन तो ये भर जायेंगे

तुम्हारे प्यार का साया है महफूज़ हैं हम
मन के आँगन से निकालोगे तो मर जायेंगे