Chithhi
Tuesday, 6 March 2012
पत्थर सनम निकला
मुतमइन था तेरा ग़म है कि वो भी मेरा ग़म निकला
समझते थे जिसे हम आशना पत्थर सनम निकला
किसी प्यासे ने साहिल पर कभी एक बूँद माँगी थी
वो राही अब भी प्यासा है समंदर बेरहम निकला
मैं गाफ़िल था मुझे ही रंज है तेरे बिछड़ने का
जो छू कर हाथ से देखा तेरा आँचल भी नम निकला
जो दिल में रखता है बिजली वो बादल आतिशी होगा
जब पानी बन के बरसा तो मेरा ये भी वहम निकला
मेरी तनहाइयां तनहा न करो
इतनी इज्ज़त से मेरा नाम न लो
मेरी रुसवाइयां रुसवा न करो
दूर रह कर ही मुझे जीने दो
मेरी तनहाइयां
तनहा
न करो
मुझे नफ़रत ही रास आती है
इस तरह प्यार से देखा न करो
मिला है ग़म तो क़लम चलती है
सितमगरी में कुछ कमी न करो
Monday, 5 March 2012
चेहरा हर बार वही आता है
जो भी आया यहाँ तड़पता रहा
कौन इसमें सुकून पाता है
प्यार साग़र भी है और आग भी है
जो नहीं डूबता , जल जाता है
उफ़क़ तक ही दिखी हद जिसकी
रास्ता दूर तलक जाता है
सिक्का दोनों तरफ़
से एक सा है
चेहरा हर बार
वही आता है
Sunday, 4 March 2012
नफ़रत की बयार
चाहतों का दौर तो गुम हो गया
अब यहाँ बहती है नफ़रत की बयार
उनसे उम्मीद क्या करें जिनको
नहीं मालूम क्या होता है प्यार
पहले रहते थे जहाँ कुछ आशना
उन घरों में बन गयीं ऊंची दीवार
जी चुके हिस्से की अपनी ज़िंदगी
कौन अब देगा हमें साँसें उधार
Saturday, 3 March 2012
मेरे पाँव में कांटे बन कर
संभल के कितना चलूँ ऐ ज़िंदगी तू बता
लोग चुभते है मेरे पाँव में कांटे बन कर
ज़रा सी बात हवाओं से अगर कहता हूँ
बढ़ के तूफ़ान उमड़ते हैं फ़साने बन कर
जिनको ये राहे मोहब्बत लगती थी सहल
अपने घर लौट गए कितने दिवाने बन कर
एक रात जी न सके परिंदे चमनज़ारों में
मर गये शाखों पे तीरों के निशाने बन कर
हमें था नाज़ कभी जिनकी आशनाई पर
पेश आये
क्यूँ
वो हमसे बेगाने बन कर
Friday, 2 March 2012
पत्थर तो न था
वो गुज़रना तुम्हारी गलियों से
था इत्तेफ़ाक, जानकर तो न था
इतना बदनाम किया है तुमने
मैं भी इंसान था पत्थर तो न था
ये शाखें आँधियों ने तोडी है
गुनाहगार एक शजर तो न था
मैं लुटा हूँ मुझे ऐसा एहसास
तेरे मिलने से पेश्तर तो न था
Thursday, 1 March 2012
वो गुज़रा ज़माना
अगले बरस ऐ सावन जब लौट के आना
एक दिन के लिए लाना वो गुज़रा ज़माना
बदली सी घिरी आँख में और भीगी निगाहें
तेरा यूँ ही मचलना और मेरा मनाना
कितनी ही कश्तियों को साहिल नहीं मिले
ग़र्दिश भी ढूंढ लेती है कोई झूठा बहाना
जागा हूँ सारी रात अब है आख़िरी पहर
लग जाए मेरी आँख मुझे तुम न जगाना
Newer Posts
Older Posts
Home
Subscribe to:
Posts (Atom)