Sunday, 7 August 2011

एक रौशनी की क़ीमत

ग़र मैंने की ख़ताएँ मुझको मुआफ़ कर दे
अब और तेरी दुश्मनी मुझसे नहीं निभेगी

बेनूर ज़िंदगी में रंग की कमी बहुत है
तेरी दोस्ती की चाहत मुझे उम्र भर रहेगी

पूछेगी ज़िन्दगी जब गुनाह उम्र भर के
मैं उससे क्या कहूँगा वो मुझसे क्या कहेगी

एक  रौशनी की क़ीमत दोनों  को  देनी होगी
परवाने भी जलेंगे  और शम्मा भी जलेगी

Saturday, 6 August 2011

सच को बचाए रखना

रुसवाइयां मिलेंगी इन प्यार की राहों में
दुनिया की रवायत है कुछ तो करेगी बात

हम ढूंढते हैं रब को मासूम निगाहों में
क्यूँ फ़िक्र करें उसकी जो दिन को कहे रात

एक  ख्वाहिशे जन्नत से दोज़ख बनी ज़मीं है
मेरे लिए है काफी ग़र तू है मेरे साथ

है जीने की जो हसरत, सच को बचाए रखना

यूँ  ही बनाए रखना हाथों में मेरा हाथ

Friday, 5 August 2011

कैसा है ये प्यार का अंदाज़

आँख से ओझल है जब परवाज़
क्यूँ भला अब दे रहे आवाज़

सर्द साँसों में सहम कर सो गए
मेरी उस दीवानगी के राज़

एक बस मैं ही सहूँ सारे सितम
कैसा है ये प्यार का अंदाज़
रात रोई है बनी  है तब ये शबनम
कितना भीगा सहर का आग़ाज़
तोड़ कर ले जायगा  कल बागवाँ
जिन गुलों पर है चमन को नाज़

हैं सितमगर आज सब गद्दीनशीन
आदमी जीने को है मोहताज

Thursday, 4 August 2011

अक्सर सभी फिसलते हैं

बंजर ज़मीन है जो तेरे पाँव  तले अच्छा है
चमकते फर्श पे अक्सर सभी फिसलते हैं

एक बुरे वक़्त में होती है दिलों की पहचान
जब भी हालात बदलते हैं दिल बदलते हैं
जला के जिसका बदन सब ने घर किया रोशन
वो बुझ गया है तो अब लोग हाथ मलते हैं

निभानी होती है महफ़िल में  रस्म हंसने की
पर हक़ीक़त  है   मेरे दिल में  दर्द पलते हैं

Wednesday, 3 August 2011

बना रख मुझे शरीक़े ग़म

मैंने फैलाए नहीं   हाथ कभी  अपने   लिए
किसी के अश्क़ जो पी लूँ वो मेरी आदत  है

कुछ और  देर  बना रख  मुझे शरीक़े ग़म
ऐसा लगता है कि तुझको  मेरी ज़रुरत है

न  पूछ मुझसे तू मेरे ज़ख्मों का हिसाब

मुझे बता कि तेरे दर्द की क्या हालत है


झुकेगा उम्र भर ये सर तेरे ही दर पे रब
तेरी नज़र जो उठे इस तरफ तो किस्मत  है

एक टुकड़ा तो बचा रखिये अपनी ग़ैरत का
सरे बाज़ार जो बिक जाइए तो लानत है

Tuesday, 2 August 2011

चल आ निकल

चल आ निकल बहती हवा में झूम लें
इस भागते पल को पकड़ कर चूम लें

लिख दें हर दीवार पर अब ये इबारत
ज़िंदगी को ज़िंदा रखती है मोहब्बत

हैं फ़लक की ओर खुलती खिड़कियाँ
जो भी गया तो फिर नहीं लौटा यहाँ

क्या मिलेगा गुमशुदा का ग़म मनाने में
जल चुकी तस्वीर के टुकड़े मिलाने में

Monday, 1 August 2011

है बे आबरू ये रूप

 छिप गया  सूरज तो देखो रो पडी है धूप
ढल गयी  है उम्र अब बे आबरू है रूप

बेरहम  है  वक़्त की चलती  हवा
किसका  दामन भीग जाए क्या पता

ऐसा ही होता है हर एक मर्तबा
ज़िंदगी देती है क्यूँ ऐसी सज़ा

दरमियाँ है नींद का लम्बा सफ़र
कल खुली जो आँख तो होगी सहर

कैसे कर दूँ मैं ये वादा शाम से
जश्न कल होगा मेरे ही नाम से