उत्तर प्रदेश जिला अलीगढ से चौदह मील दूर है एक क़स्बा खैर । वहीं जन्मा था मैं सन १९४९ मेँ । निम्न मध्य वर्ग से कुछ और कमज़ोर परिवार । जब होश संभाला तब उस समय हम चार भाई और एक बहन मिला कर पांच थे । मैं सबसे छोटा था । जन्म से पहले तीन बड़ी बहनें जीवित नहीं रह सकीं । कुल मिला कर मैं अपनी माँ की आठवीं संतान था । पिता एक इंटर कॉलेज में संस्कृत के अध्यापक थे । आर्थिक हालात इतने कमज़ोर कि मेरे जन्म के समय प्रसव का पूरा कार्य मेरी बड़ी बहन ने अपने हाथों से कराया था । प्रारम्भ में कोई पारम्परिक शिक्षा नहीं मिली । परन्तु सौभाग्यवश गणित के एक प्रश्न से प्रभावित हो कर , पिता जिस स्कूल में पढ़ाते थे उसके प्रिंसिपल श्री किशोरी लाल जी ने मेरा दाखिला सीधे पांचवीं कक्षा में कर दिया । उम्र कोई छह वर्ष कुछ माह रही होगी । गणित के अलावा विषय और भी थे जिन्हे समझनै में प्रारम्भ में बहुत कठिनाई हुई । आगे की कुछ कक्षाओं में गाडी लखड़ाते हुए आगे बड़ी ,पर नवी कक्षा में आते आते बुद्धि विकसित हुई और मेरा अपनी कक्षा में तीसरा स्थान आया । अगले वर्ष यू पी बोर्ड से हाई स्कूल की परीक्षा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण तो हुआ परन्तु बोर्ड में रैंक अच्छी नहीं थी फिर भी १६ रुपये प्रति माह की छात्रवृति मिलने लगी ।
Sunday, 14 September 2014
Sunday, 6 July 2014
यहाँ बहरे हैँ लोग
खामखाँ इनसे बहस मत कीजिये
हार जाओगे बहुत गहरें हैँ लोग
सुन नहीं सकते प्रलय की चींख क़ो
सो गए हैँ या यहाँ बहरे हैँ लोग
मर गया है क्या कोई फिर राहज़न
चलते चलते क्यों यहां ठहरे हैँ लोग
हो चुका सब कुछ नया मत सोचिए
एक खड़ी दीवार हैं , पहरे हैँ लोग़
हार जाओगे बहुत गहरें हैँ लोग
सुन नहीं सकते प्रलय की चींख क़ो
सो गए हैँ या यहाँ बहरे हैँ लोग
मर गया है क्या कोई फिर राहज़न
चलते चलते क्यों यहां ठहरे हैँ लोग
हो चुका सब कुछ नया मत सोचिए
एक खड़ी दीवार हैं , पहरे हैँ लोग़
Saturday, 17 May 2014
तो हम तुम भी वली होते
इबादत को समझ पाते
तो हम तुम भी वली होते
ज़ख्म की टीस गर सहते
तो कांटे भी कली होते
नास्तिक है भूखा पेट
बस यही सोचता है
ये शजर से टूटते पत्ते
एक रोटी अधजली होते
तो हम तुम भी वली होते
ज़ख्म की टीस गर सहते
तो कांटे भी कली होते
नास्तिक है भूखा पेट
बस यही सोचता है
ये शजर से टूटते पत्ते
एक रोटी अधजली होते
Tuesday, 29 April 2014
तो ईश्वर न होता
किसी दर पे तेरा झुका सर न होता
अगर डर न होता तो ईश्वर न होता
अगर मंज़िलें अपने हाथो में होतीं
तो दुनिया में कोई मुसाफिर न होता
तुझे ज़ुल्म सहने की आदत न होती
तो ज़ालिम कभी तेरा रहबर न होता
अगर आसमानों से कुछ रिश्ते बनाता
तो गिरने को बिजली तेरा घर न होता
अगर डर न होता तो ईश्वर न होता
अगर मंज़िलें अपने हाथो में होतीं
तो दुनिया में कोई मुसाफिर न होता
तुझे ज़ुल्म सहने की आदत न होती
तो ज़ालिम कभी तेरा रहबर न होता
अगर आसमानों से कुछ रिश्ते बनाता
तो गिरने को बिजली तेरा घर न होता
Wednesday, 2 April 2014
लोग जला देते हैं
बदनसीब है बदन चरागों की तरह
बुझने लगता है तो लोग जला देते हैं
कौन जलते ज़ख्मों पे रक्खे मरहम
जो हैं पहचान वाले बढ़ के हवा देते हैं
बुझने लगता है तो लोग जला देते हैं
कौन जलते ज़ख्मों पे रक्खे मरहम
जो हैं पहचान वाले बढ़ के हवा देते हैं
Friday, 7 March 2014
जिनकी तालीम
जिनकी तालीम उठाती है इंसानी क़द
ऐसे इंसान ज़माने को गिरे लगते हैं
जिनके साये ने रोकी है सूरज की तपिश
धूप ढल जाय तो वे लोग बुरे लगते हैं
कभी एक तरफ से नहीं जुड़ते रिश्ते
जोड़ बनने में दोनों ही सिरे लगते हैं
इतने गहरे हैं कुछ ज़ख्म तेरी यादों के
बरस बीत गए फिर भी हरे लगते हैं
ऐसे इंसान ज़माने को गिरे लगते हैं
जिनके साये ने रोकी है सूरज की तपिश
धूप ढल जाय तो वे लोग बुरे लगते हैं
कभी एक तरफ से नहीं जुड़ते रिश्ते
जोड़ बनने में दोनों ही सिरे लगते हैं
इतने गहरे हैं कुछ ज़ख्म तेरी यादों के
बरस बीत गए फिर भी हरे लगते हैं
Sunday, 16 February 2014
मैं उतना भी बुरा नहीं हूँ
मैं एक शजर हूँ तेरे चमन का
और ये भी सच है हरा नहीं हूँ
थका हूँ लड़ लड़ कर आँधियों से
खड़ा हूँ अब भी गिरा नहीं हूँ
समझ रहें हैं ज़माने वाले
मैं उतना भी बुरा नहीं हूँ
न कोसना तुम मेरी बेखुदी को
आँख लगी है मरा नहीं हूँ
और ये भी सच है हरा नहीं हूँ
थका हूँ लड़ लड़ कर आँधियों से
खड़ा हूँ अब भी गिरा नहीं हूँ
समझ रहें हैं ज़माने वाले
मैं उतना भी बुरा नहीं हूँ
न कोसना तुम मेरी बेखुदी को
आँख लगी है मरा नहीं हूँ
Subscribe to:
Posts (Atom)