Tuesday, 16 July 2013

मैं उसी निगाह में क़ैद हूँ


मैं उसी निगाह में क़ैद  हूँ   जिसे दिल जलाने का शौक़ है
न  मिलेगा मुझको वो बेरहम उसे आज़माने  का शौक़ है

उस  बेवफ़ा का  हूँ  मुन्तजिर एक रात में जो बदल गया
कभी ये सनम कभी वो सनम ये नए ज़माने का शौक़ है 

 ग़र एक बार की बात हो कोई रख दें कलेजा निकाल
के
उसे  कौन कब तक  मनायेगा  जिसे रुंठ जाने का शौक़ है

अब तेरे बिछड़े मकान में रहने आ गया है कोई  अजनबी
जो पुकारता था वो चला  गया  किसे अब बुलाने का शौक़ है

Wednesday, 10 July 2013

ये वो ग़म का खज़ाना है

मोहब्बत में सुकूँ का कोई भी आलम नहीं होता
ये वो ग़म का खज़ाना है कभी जो कम नहीं होता

तन्हाई रात की रह रह पिघलती है तो बनता है
समन्दर में हर क़तरा आब का शबनम नहीं होता

जो खुशियाँ हैं तो फिर क्या है ज़माना ही हमारा है
छलकती आँख का कोई यहाँ हमदम नहीं होता

फिजायें कैसी भी बदलें भिगो जातीं हैं दामन को
जो आंसू सोख ले ऐसा कोई मौसम नहीं होता

Thursday, 20 June 2013

हर एक खुशी से पहले

ग़म देर तक रुका है हर एक खुशी से पहले
हाँ   कुछ तो होश था हमें इस बेखुदी से पहले

ये  वक़्त का जादू है  किस को न बदल डाले
इंसान  एक बना  था इस आदमी से पहले

इस खेल में  किसी का मुक़द्दर न  डूब जाए
थोडा था सोचा करिए एक दिल्लगी  से पहले

ख्वाबों का आशियाँ क्यूँ कर सजाये कोई
सामान ए मौत हाज़िर है ज़िंदगी से पहले

Sunday, 16 June 2013

कुछ इस तरह गए तुम

कुछ इस तरह गए तुम मेरी ज़िंदगी में आके
ठहरे हुए पानी को हिला दे कोई पत्थर

जितनी भी कोशिशें कीं लहरों ने बिछड़ने की
हर बार उतना ही बड़ा होता गया सागर

औरों से पूछते हो क्या मैं अभी ज़िंदा हूँ
बेहतर है मेरे घर में खुद देख लो आकर

Wednesday, 20 March 2013

पत्ते सूखे ही सही

पत्ते सूखे ही सही फिर भी एक गवाह तो हैं 
इस  बयाबां में भी  एक दिन बहार आयी थी

भले ही  लाख  कहो प्यार नहीं था   मुझसे
मिली जो नज़रें तेरी आँख क्यूँ शरमाई थी

अलग मिला था सिला प्यार का हम दोनों को
वो  दास्ताँ तेरी शोहरत मेरी रुसवाई थी

गुलों की शोखियों ने तुझको भुलाने न दिया
झूमती शाख को देखा तू याद आयी थी  

Friday, 8 February 2013

ग़र न हो

ग़र न हो आब तो आंसू मिलाइये
बड़ी है तल्ख़ ये ग़मों की शराब

या ख़ुदा काश ये भी हो सकता
तेरे चेहरे पे जो रुक जाता शबाब

ज़िंदगी हुस्न की तिजारत है
यहाँ हर उम्र को देना है हिसाब

बहस तो हर रोज़ हुआ करती है
उनमें होते नहीं सवालों के जवाब

Saturday, 2 February 2013

एक आशियाँ था यहाँ

एक आशियाँ था यहाँ
कहाँ गया चलो आँधियों से पूछते हैं

एक घोंसला था चिड़िया का
किसने तोडा चलो पंछियों से पूछते हैं

बिना बताये उनका चुप रहना
कोई इतना तो बताये वो क्यूँ रूठते हैं

हवा चले या कि खामोश रहे
पत्तों को टूटना होता है सो रोज़ टूटते हैं