चलो इन हाशियों पर प्यार के दो हर्फ़ लिख डालें
ख़तों में बेवजह खाली जगह देखी नहीं जाती
ज़माना रूठता है रूठ जाए हमको इससे क्या
बस एक तुम हो तुम्हारी बेरुख़ी देखी नहीं जाती
मेरे लिए काफ़ी है ये ही मैं जो तुझसे प्यार करता हूँ
अब तुमसे मेरी इतनी भी खुशी देखी नहीं जाती
हमें ही एक दिन बस छोड़ कर जाना है दुनियां को
ये दुनिया है ज़माने से कहीं भी ये नहीं जाती
Tuesday, 4 September 2012
और क्या है तू
फ़लक नहीं , ज़मीं नहीं हवा भी नहीं
आबो आतिश नहीं तो और क्या है तू
गिर के टूटें हैं तो आज ये जाना हमने
हम हैं सब क़ैदी मुश्किल बड़ी सज़ा है तू
ज़िंदगी तुझको सराहा है मिन्नतें भी कीं
एक दिन छोड़ के चल देगी बेवफा है तू
यहाँ होता है जो वो सच में नहीं होता है
सिर्फ होने का सा एहसास हो गया है तू
फ़लक --> आसमान , आबो आतिश-->पानी और आग
Sunday, 2 September 2012
एक दीवानी नज़र
एक दीवानी नज़र कितना देख सकती है
तुमको क्या समझे थे क्या तुम निकले
मत बताना किसी को कि मर चुका हूँ मैं
सूनी राहों से जनाज़ा मेरा गुमसुम निकले
मेरी ख्वाहिश है मेरी मौत पे रोये न कोई
सिसकी भी अगर ले तो वो मद्धम निकले
माहताब के मानिंद चमकता रहे चेहरा तेरा
जब भी देखूं मैं तेरी आँख न पुरनम निकले
Saturday, 1 September 2012
सरहदें बदलतीं हैं
क्या बताएं कि कहाँ तक है दिल की दुनिया
रोज़ ही सरहदें बदलतीं हैं
आज मेरे हो कल किसी और के हो सकते हो
बारहा चाहतें बदलती हैं
जब भी भर जाता है दिल आँख छलक जाती है
इस तरह हसरतें निकलती हैं
ज़रा जल जाएँ तो फिर कितना तड़पते हैं लोग
शमाएँ सारी रात जलतीं हैं
Friday, 31 August 2012
कुछ दुआ कम है
प्यार सिमटे तो तेरे होठों तक
गर जो फैले तो ये जहां कम है
क़तरा बाकी नहीं जिगर में मेरे
उनको लगता है खूं बहा कम है
लोग बचते हैं मेरा नाम लेने से
आज रुसवाइयों का ये आलम है
तू मिला है न मिलेगा मुझको
मेरे हिस्से में कुछ दुआ कम है
क़त्ल कर के मेरा वो कहते हैं
हुआ है जो भी वो हुआ कम है
हुआ है जो भी वो हुआ कम है
Wednesday, 29 August 2012
चाहता हूँ तुझे
तेरी कमियाँ पसंद आने लगीं
ऐसा लगता है चाहता हूँ तुझे
मांग कर रब से थक गया हूँ मैं
आज तुझ ही से मांगता हूँ तुझे
मय से बुझती तो बुझ गयी होती
रूह की प्यास कब पीने से बुझे
मेरी रग रग में रह रहा है तू
दर ब दर मैं तलाशता हूँ तुझे
Tuesday, 28 August 2012
हम सादगी का तेरी
हम सादगी का तेरी करें किस तरह बयाँ
मासूमियत ही जैसे इंसान बन गयी है
कुछ पल के लिए आयी आँखों में तेरी सूरत
अब रातो दिन की जैसे महमान बन गयी है
एक तेरी आरज़ू भी कर ली है जब से दिल ने
मेरी हर ग़ज़ल का जैसे उन्वान बन गयी है
मिलने से पहले तुझसे अपना वजूद भी था
अब तू ही ज़िंदगी की पहचान बन गयी है
मासूमियत ही जैसे इंसान बन गयी है
कुछ पल के लिए आयी आँखों में तेरी सूरत
अब रातो दिन की जैसे महमान बन गयी है
एक तेरी आरज़ू भी कर ली है जब से दिल ने
मेरी हर ग़ज़ल का जैसे उन्वान बन गयी है
मिलने से पहले तुझसे अपना वजूद भी था
अब तू ही ज़िंदगी की पहचान बन गयी है
Subscribe to:
Posts (Atom)