जाने कितनी ही रातों में , ये चाँद कहीं खो जाता है
भटकों को राह दिखाने को ,तारों को चमकना होता है
दुनियाँदारों का क्या कहिये ,हर क़दम संभल कर रखते हैं
तब मय का मान बढ़ाने को ,रिंदों को बहकना होता है
दिन से अक्सर लड़ते लड़ते , बेहोश बदन हो जाता है
जीवन की डोर चलाने को , तब दिल को धड़कना होता है
शाखें पत्ते जब शाम ढले ,सब अपनी थकन मिटाते हैं
आबरू ऐ चमन बचाने को, फूलों को महकना होता है
Tuesday, 28 August 2012
Wednesday, 15 August 2012
खरीदार ढूँढते हैं
क़त्ल महबूब का हमने अपने हाथों से किया है
आवारा बन के गलियों में अब प्यार ढूँढते हैं
सब कुछ तो बिक गया है सियासत के खेल में
अब देश बेचना है खरीदार ढूँढते हैं
जो सदियों से खाती रही मौजों के थपेड़े
उस टूटी हुई क़श्ती में रफ़्तार ढूँढ़ते हैं
अपने ही गुनाहों से मिली है हमें शिक़स्त
क्यूँ जा के बस्तियों में गुनहगार ढूंढते हैं
Friday, 3 August 2012
एक मुश्किल सफ़र है
नहीं ग़म मुझे अपनी रुसवाइयों का
वो बदनाम ना हो मुझे इसका डर है
तुम आओ मगर मेरे पीछे न आओ
मेरा रास्ता एक मुश्किल सफ़र है
किसे दोस्त समझें किसे अपना दुश्मन
जो कल तक इधर था अभी वो उधर है
ना इनके भरोसे घर अपना सजाना
शमाओं का जलवा बस एक रात भर है
Thursday, 2 August 2012
न है आईना न है रोशनी
न ज़मीर है न ख़ुलूस है , न है आईना न है रोशनी
ये बतायेगा हमें कौन अब ,है कैसी सूरते ज़िंदगी
जो मिला उसे भुला दिया, जो नहीं मिला उसे ढूँढती
एक हसरतों का हुजूम है , तेरी ज़िंदगी मेरी ज़िंदगी
हम बच गए हैं अंधेरों से , हमें मार डालेगी रोशनीये बतायेगा हमें कौन अब ,है कैसी सूरते ज़िंदगी
जो मिला उसे भुला दिया, जो नहीं मिला उसे ढूँढती
एक हसरतों का हुजूम है , तेरी ज़िंदगी मेरी ज़िंदगी
अपना क़फ़न खरीद कर, खुद को जलाएगा आदमीं
जो कहता था बड़े नाज़ से तेरे ग़म में मैं भी शरीक़ हूँ
मुझे कब से उसकी तलाश है कहाँ खो गया है वो आदमी
Sunday, 15 July 2012
किसी फ़क़ीर की दुआ हूँ मैं
ज़ेहन में ज़िंदा हैं यादों के फूल
इतना बंजर नहीं हुआ हूँ मैं
अपने सीने में सजा कर रख लो
किसी फ़क़ीर की दुआ हूँ मैं
तेरी खुशियों से दूर हूँ फिर भी
तेरे हर ग़म से आशना हूँ मैं
मेरे हमदम मुझे बाहों में न भर
हवा में फैलता धुआं हूँ मैं
लफ़्ज़ों की शक्ल में आंसू बन कर
कितने जन्मों से बह रहा हूँ मैं
इस क़दर डूबा तेरी आँखों में
अब तो ख़ुद को ही ढूंढता हूँ मैं
इतना बंजर नहीं हुआ हूँ मैं
अपने सीने में सजा कर रख लो
किसी फ़क़ीर की दुआ हूँ मैं
तेरी खुशियों से दूर हूँ फिर भी
तेरे हर ग़म से आशना हूँ मैं
मेरे हमदम मुझे बाहों में न भर
हवा में फैलता धुआं हूँ मैं
लफ़्ज़ों की शक्ल में आंसू बन कर
कितने जन्मों से बह रहा हूँ मैं
इस क़दर डूबा तेरी आँखों में
अब तो ख़ुद को ही ढूंढता हूँ मैं
Thursday, 5 July 2012
परछाइयाँ नहीं जाती
वक़्त आ कर के चला जाता है
उसकी परछाइयाँ नहीं जाती
इतना भीगा है आंसुओं से दामन
अब तो खुशियाँ सही नहीं जातीं
प्यार खामोशियों में पलता है
सारी बातें कही नहीं जातीं
लोग शोहरत तो भूल जाते हैं
पर ये रुसवाइयां नहीं जातीं
काम आती नहीं मेरी तालीम
उन की आँखें पढी नहीं जातीं
इतने लोगों से घिरा रहता हूँ
फिर भी तनहाइयां नहीं जातीं
Thursday, 14 June 2012
मंज़िल किधर गयी
मुश्किल है दौर इतना और उम्र थक गयी
अब किससे जा के पूछें मंज़िल किधर गयी
बाज़ार में पूछा था "इंसानियत मिलेगी ?"
सब हंस के कह रहे थे "वो कब की मर गयी "
ना जाने क्यूँ हम उसकी नज़र से उतर गये
तस्वीर जिसकी नज़रों से दिल में उतर गयी
दीवानेपन की इंतिहा थी तुझसे मोहब्बत
एक तू ही तू दिखता था जहाँ तक नज़र गयी
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