Wednesday, 11 January 2012
Tuesday, 10 January 2012
तू सो जाए
कटी पतंग और उड़ने का शौक़
तेरी दुनियां में क्या न हो जाए
हम इबादत करें तो किसकी करें
रब जो उनकी गली में खो जाए
इस बुरे दौर में जी करता है
मैं ही जगता रहूँ तू सो जाए
किसे बुलाएं कि बचा लो हमें
कोई अपना अगर डुबो जाए
मुझे ये डर है कौन सा लमहा
मेरी पलकों को फिर भिगो जाए
इस क़दर निकले मेरे दिल से लहू
मेरे माज़ी के दाग़ धो जाए
ये मज़ारे मुफ़लिस है
काश ये ग़म भी हुआ करते कुछ तेरी तरह
हमसे मिलते और चले जाते अजनबी बनकर
कि तुम निगाह मिलाते रहे फ़रिश्तों से
हमने देखा तेरी महफ़िल में आदमी बनकर
रोज़ आती है तेरी याद दिल जलाने को
कभी तो तू भी आ इस घर में रोशनी बनकर
न जला तू इस पे दिये ,ये मज़ारे मुफ़लिस है
प्यार तेरा भी न रह जाए दिल्लगी बनकर
Sunday, 8 January 2012
जेब से खंजर निकला
बड़ी है तल्ख़ ज़िंदगी की शराब
हर एक घूंट से जलता है गला
जब भी ग़ुरबत में हाथ फैलाये
हर एक जेब से खंजर निकला
क़त्ल में सारा शहर शामिल था
क्यूँ करूँ मैं फ़क़त तुमसे ही गिला
बहुत पहले ही से बेहोश हूँ मैं
मेरे साक़ी मुझे तू अब न पिला
न ग़र सुकूँ तो तशद्दुद ही सही
तेरी सोहबत से हमें कुछ तो मिला
ये जानते हैं कि जान जायेगी
हमें मालूम है मोहब्बत का सिला
हर एक घूंट से जलता है गला
जब भी ग़ुरबत में हाथ फैलाये
हर एक जेब से खंजर निकला
क़त्ल में सारा शहर शामिल था
क्यूँ करूँ मैं फ़क़त तुमसे ही गिला
बहुत पहले ही से बेहोश हूँ मैं
मेरे साक़ी मुझे तू अब न पिला
न ग़र सुकूँ तो तशद्दुद ही सही
तेरी सोहबत से हमें कुछ तो मिला
ये जानते हैं कि जान जायेगी
हमें मालूम है मोहब्बत का सिला
Friday, 30 December 2011
ग़लती मेरी नज़र की थी
आएगा नया साल तो जाएगा गया साल
फिर उठ के खड़े होंगे कुछ और नए सवाल
या उम्र बढ़ेगी या घटेंगे ज़िंदगी के दिन
अब जाने किस इरादे से आएगा नया साल
तू मेरे लिए रूक न सका सिर्फ दो घड़ी
तब दिल में क्यूँ रुका है अब भी तेरा ख़याल
आँखों में आ के बस गयी है क्यूँ तेरी तस्वीर
ग़लती मेरी नज़र की थी या था तेरा जमाल
फिर उठ के खड़े होंगे कुछ और नए सवाल
या उम्र बढ़ेगी या घटेंगे ज़िंदगी के दिन
अब जाने किस इरादे से आएगा नया साल
तू मेरे लिए रूक न सका सिर्फ दो घड़ी
तब दिल में क्यूँ रुका है अब भी तेरा ख़याल
आँखों में आ के बस गयी है क्यूँ तेरी तस्वीर
ग़लती मेरी नज़र की थी या था तेरा जमाल
शमा बुझती है
तेरे बुलाने पे आये थे तेरी बज़्म में हम
नहीं पसंद तुझे ग़र तो चलो चलते हैं
नहीं बजता है हर घड़ी यहाँ राग बहार
वक़्त के साथ ज़माने के सुर बदलते हैं
बंदिशें इतनी हैं दुनियाँ की फिर भी
राहे उल्फत में अरमान क्यूँ मचलते है
फितरतें हैं छिपीं शब के इन अंधेरों में
शमा बुझती है बेशुमार बदन जलते हैं
Monday, 26 December 2011
ज़िंदा है प्यार
अभी कल ही तो यहाँ आया था चमन पे शबाब
कैसा तारी था हर एक कली पे निखार
वक्ते रूखसत है तो ख़ुद देख अपनी आँखों से
पत्ते पत्ते सी किस तरहा बिखरी है बहार
ये तेरा हुस्न भी एक दिन तो बिखर जाएगा
रूह बेदाग़ बना तू अपनी ज़ुल्फें न संवार
हर एक शम्मा अपनी उम्र ले के आती है
बदन तो रोज़ यहाँ मरते हैं ज़िंदा है प्यार
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