Wednesday, 12 October 2011
Tuesday, 11 October 2011
बुझ गए हैं चिराग़
रोते लोगों की क़तारें खड़ी हैं मेरे दरवाजे पे
क्या कोई आसमानी रूह थक कर सो गई है
उल्फ़त के मजारों पे बुझ गए हैं चराग़
शबे महताब है पर रोशनी कम हो गयी है
...
जाने वाले से मेरा कोई भी रिश्ता न था
फिर भी क्यूँ ये आँख पुरनम हो गई है
दिल में बसती थी एक मखमली आवाज
ऐसा लगता है कि अब वो भी मद्धम हो गई है
Friday, 7 October 2011
पी तू शराबे इश्क़
करते हो अगर प्यार तो इज़हार भी करना
कुछ भी नहीं हासिल यूँ ही घुट घुट के जीने में
ये दर्द अगर रो के निकल जाए सही है
ग़र रह गया बन जायेंगे नासूर सीने में
पी तू शराबे इश्क़ कि मयखाना दहल जाए
है क्या मज़ा प्याले से बस दो घूँट पीने में
ये दिल है मेरा बारहा तोड़ा गया शीशा
कट जायेगी उंगली तेरी टुकड़ों को छूने में
Thursday, 6 October 2011
मर जायगा रावण तभी
मरता है केवल आदमी ,मरता नहीं रावण कभी
पत्थर के दिल जलते नहीं ,जलता है एक बेबस का जी
इतने बरसों से जलाते आ रहे हैं जिसको हम
जिस्म बस जलता है उसका रूह ज़िंदा है अभी
भूख से बदहाल रामू किस क़दर माज़ूर है
राम घर आ जायेंगे रामू को दे दो ज़िंदगी
भुखमरी को जीत लो तुम जीत होगी राम की
सच की चादर ओढ़ लो मर पायगा रावण तभी
भूख से बदहाल रामू किस क़दर माज़ूर है
राम घर आ जायेंगे रामू को दे दो ज़िंदगी
भुखमरी को जीत लो तुम जीत होगी राम की
सच की चादर ओढ़ लो मर पायगा रावण तभी
Monday, 3 October 2011
एक तेरी जुस्तजू में
रंगीनियाँ होती हैं बस ख़्वाबों की महफ़िल में
है ज़िंदगी हक़ीक़त एक उलझा रास्ता है
होती नहीं है जिसको दो गज़ ज़मीन हासिल
वो आसमां में अपना एक घर तलाशता है
रखते हैं हमको जिंदा पलकों में सजे सपने
परियों के फ़सानों का बचपन से वास्ता है
थक कर के सो गए हैं सब साथ के मुसाफ़िर
एक तेरी जुस्तजू में क्यूँ दिल ये जागता है
Saturday, 1 October 2011
बदल जायेंगे तेवर
पैरों में बेडी बाँध के कहते हैं नाचिये
कैसे अजीब हो गए हैं आज हुक्मरान
झपकाओगे पलकें तो बदल जायेंगे तेवर
ख़ंजर छुपाये बैठे हैं ये सारे क़द्रदान
जाकर नए बाज़ारों में नफ़रत खरीदिये
अब बंद हो चुकी हैं मोहब्बत की सब दुकान
बस बोरिया बिस्तर ही उठाने की देर है
पहले ही बिक चुका है घर का सभी सामान
कैसे अजीब हो गए हैं आज हुक्मरान
झपकाओगे पलकें तो बदल जायेंगे तेवर
ख़ंजर छुपाये बैठे हैं ये सारे क़द्रदान
जाकर नए बाज़ारों में नफ़रत खरीदिये
अब बंद हो चुकी हैं मोहब्बत की सब दुकान
बस बोरिया बिस्तर ही उठाने की देर है
पहले ही बिक चुका है घर का सभी सामान
गो भर चुकी क़िताबे दिल
क़ासिद से हम भी करते रहे बेवजह बहस
तेरी तरफ़ से आया था कोई भी ख़त नहीं
निकला हूँ हो के रुसवा तेरी बज़्म से हर बार
दिल से तुझे निकाल दूं , ऐसी सिफ़त नहीं
बचने के आफ़ताब से साये तो हैं बहुत
नफ़रत की आग रोकती कोई भी छत नहीं
गो भर गए क़िताबे दिल में जाने कितने हर्फ़
एक तेरे नाम का कोई भी दस्तख़त नहीं
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