Saturday, 18 June 2011

वफ़ा की तंग गलियों


महकते फूलों की ऋतु में, पवन के झूमते झोंके
गिरा कर सुर्ख़ गुंचों को, धरा की मांग भरते हैं

तो फिर माज़ी के पन्नों में , तेरी तस्वीर बनती है
मेरी पलकों की कोरों से , कई सावन गुज़रते हैं
 
वफ़ा की तंग गलियों   में   बड़ा  वहशी अँधेरा है
कि उस बस्ती में  जाने से अधिकतर लोग डरते हैं

तरक्क़ी के इन शोलों ने जला डाले सभी रिश्ते
हवस  की बदहवासी में हम कुछ भी कर गुज़रते हैं

कोई जीने को मरता है कोई जीता है मरने को
है आखिर फ़ैसला रब का कि हम जीते या मरते हैं




Friday, 17 June 2011

अभी जिंदा हूँ



दिल की  देहलीज़ तक  अब आ गया है ग़म
मेरा मेहमान है   अन्दर तो बिठाना होगा



कुछ लोग ढूँढ़ते हैं मेरे दफ़्न की   जगह
अभी जिंदा हूँ उन्हें जा के बताना होगा

कोई भी नहीं होती  अब मेरी दुआ क़ुबूल
एक  नया  और ख़ुदा ढूंढ़  के लाना होगा

तुम जो  कहते हो तुम्हे भूल जाएँ हम
तुम्ही बताओ तुम्हे कैसे भुलाना होगा

Thursday, 16 June 2011

पत्तों का शोर है


मुद्दत हुई जो आपकी आँखों से पी थी मय
अब तो ज़ेहन में बच गया उसका ख़ुमार है

वो मौसमे गुल आया था आ कर चला गया
अब तो चमन में सिर्फ एक ज़िक्रे बहार है

आँखों में जो तस्वीर थी वो मिट गई मगर
दिल पे भला किसी का कहाँ इख्तियार है

ये क़दमों की आहट नहीं पत्तों का शोर है
वो जा चुका है जिसका तुम्हे इंतज़ार है

है कौन इस जहाँ में जो करता नहीं गुनाह
तू  इस बेइरादा प्यार पे क्यूँ शर्मसार है






Wednesday, 15 June 2011

हमपे अपनों ने सितम ढाए हैं


और करता तो ग़म नहीं होता
हम पे अपनों ने सितम ढाए हैं

कल कटेंगे सभी ऊँचे दरख़्त
जो खड़े आज सर उठाये हैं
 
उड़ने का मुंतज़िर है परिंदा एक
उम्र भर  जिसने पर कटाये है

सारी तोहमत मुझ ही पर क्यूँ
तुमने भी फासले बढ़ाये हैं

अपने चेहरे के ये काले धब्बे
तूने खुद हाथ से बनाए हैं

अभी ताज़ा हैं इस बदन पे निशां
तूने जो तीर आज़माए है

मदारी कौन है


सोच लोगों  का अनूठा बन चुका है
चमकते भारत का भूसा बन चुका है

जन्म के वक़्त चार उंगलियाँ भी थीं
हाथ अब सबका  अंगूठा बन चुका है

रात को दिन और दिन को रात
बेहया वो इतना झूठा बन चुका है

जानते हैं सब मदारी कौन है
देश का आक़ा जमूडा बन चुका है     

Tuesday, 14 June 2011

जलता है शहर

क्यूँ शर्म से झुकी हैं, ये फूलों की डालियाँ 
गुलशन में कोई हादसा ,हुआ तो है ज़रूर 

वो लौट कर दरवाजे से ,वापस चला गया 
उससे किसी ने कुछ न कुछ ,कहा तो है ज़रूर 

जलता है शहर फिर भी , जिंदा हैं आज हम 
हम पे फकीरों की कुछ, दुआ तो है ज़रूर 

जो सच किसी ने बोला तो , पायेगा वो सलीब
ऐसा ही कल एक फैसला, हुआ तो है ज़रूर

Monday, 13 June 2011

बिछा कर के प्यार की चादर


बंद आँखों पे बिछा कर के प्यार की चादर
करेंगे हम भी एक रोज़ फ़लक तक का सफ़र
उसी तरहा से चलेगा ये कारवां ऐ जहाँ
एक बस हम ही तुमको नहीं आयेंगे नज़र

यही बस होता चला आया यहाँ सदियों से
कोई ताकत न बदल पाई यहाँ का दस्तूर
बस इतना ही तो है फलसफा ए हयात
मैं भी मजबूर हूँ हालात से तू भी मजबूर