Monday, 13 June 2011

शमा मासूम है कितनी

जो तेरे सामने होने से कुछ तबियत संभलती है 
तेरा दीदार दिलकश है ,तो क्या ये मेरी ग़लती है ? 


ये दुनियां है यहाँ हर रोज़ ही, सब कुछ बदलता है
कोई सो जाता है थक कर ,किसी की आँख खुलती है


सफ़र की दूरियों का फ़र्क़ है, बस तुझ में और मुझ में
जब तेरा दिन निकलता है ,तो मेरी शाम ढलती है



तू कुछ तो क़द्र कर उसकी ,शमा मासूम है कितनी
रहे बस घर तेरा रोशन , वो सारी रात जलती है

Saturday, 11 June 2011

वही वतन की हवा मांगती है तुझसे हिसाब


असल जो लूट थी वो बंट गयी है यारों में
बची झूठन को अब बांटेंगे वो क़तारों में

मेरे चेहरे में जो ढूंढे हैं तूने चंद दाग़
तेरी फ़ितरत में वो होंगे कई हज़ारों में

जहाँ रहो उसे लूटो और फिर चलते बनो
मैंने माना ये होता है फिरंगी का मिजाज़

जिसकी खुशबू से धड़कता है तेरे सीने में दिल
वही वतन की हवा मांगती है तुझसे हिसाब



जिंदा रहने का है बस हक़ रसूक़ वालों को
हर एक मोहसिन के हिस्से अब आएगी सलीब

कितना नायाब है अंदाज़े सियासत देखो
चैन से जियो क़त्ल कर के तुम अपना रक़ीब

Wednesday, 8 June 2011

उजाले की नस्ल


इन तेज आँधियों में एक दिया है जल रहा
उसको बचा लो तुम जला कर हथेलियाँ

सब हो चुके  फ़ना अब सियाही से जंग में

उजाले की नस्ल का है ये एक आख़िरी निशां

वो रोज़ हड़पता रहा , मेरे घर की भी ज़मीन
मुझको दिखा दिखा के, सितारे और आसमां


अब झूठ और सच में कोई फ़र्क़ नहीं है
एक पतली सी दरार है दोनों के दरमियाँ

सौ झूठ बोल कर के  वो  पा जाता है इनाम
एक सच जो ग़र हम बोलें तो बनता है  एक गुनाह

Tuesday, 7 June 2011

मज़हब है उसका कुर्सी

ये राम का है प्रेमी ,वो अल्लाह का बंदा है
बस आग लगाने का, आसान सा धंधा है
तेरा और मेरा भी ,बस एक हश्र तय है
दो गज़ सफ़ेद कपडा , और यार का कंधा है

वो है कि या नहीं है ,ये कौन जानता है
फिर इतने सारे क़िस्से, क्यूँ कर बखानता है
ये कैसी  दुश्मनी है , किस बात का है झगड़ा
मैं इसको मानता हूँ,तू उसको मानता है
मसाइल हैं एक जैसे , और हश्र एक जैसा
किस बात पर है बिगड़ा ,ये अपना मरासिम है
दिन सारा गुज़र जाए,और मिले न एक निवाला
क्या भूख सोचती है,ये हिन्दू है ये मुस्लिम है
मज़हब है उसका कुर्सी, पैसा है उसका ईमां
जो आज हुआ तुझपे , यूँ बेवजा मेहरबाँ
सियासत के खेल का, शातिर वो एक खिलाडी
 गरीबी और ये मज़हब ,उसके खेलने के सामां

Sunday, 5 June 2011

तू फ़रिश्ता है


वो मेरे हक़ में  फैसला देगा, कल तलक मैं इसी उम्मीद में था
उसने मुझको तभी मारा खंज़र, जब मैं सोया था गहरी नींद में था


चलो ऐसा है तो ऐसा ही सही ,तू  फ़रिश्ता है गुनहगार हूँ मैं
तेरे भी चैन में ख़लल  तो पड़े,आज मरने को भी तैयार हूँ मैं


कैसी तक़दीर लिखा लाये हम , हुई सहर तो खा लिया उजालों ने
पहले ग़ैरों ने चमन को लूटा,    बाद में लूटा चमन वालों ने

Saturday, 4 June 2011

नियति सपेरन


समय बटोही पंख लगा कर, उड़ता जाता प्रबल वेग से
वो भी याद बहुत आते हैं ,जो पल पीछे छुट जाते है
दूर क्षितिज है कितना हमसे, कौन हमें ये बतलायेगा
राहें कहाँ रुकी हैं अब तक , बस हम ही तो रुक जाते हैं
 
 
जो आया है वो जाएगा ,यही कहानी चलती आई
कितना भी श्रंगार करो तुम, होनी है एक रोज़ विदाई 

जीवन की आपाधापी में ,जाने कितने लक्ष्य बनाते
बीन बजाती नियति सपेरन ,सारे अर्थ बदल जाते हैं

पहले जब  छत पर चढ़ते थे  , दिखता था वो  गाँव तुम्हारा
हम तुम और बरखा की बूंदे ,बस इतना  संसार हमारा
आज प्रगति की इस आंधी ने, की ऐसी दीवार खड़ी है 
जाने पहचाने भी चेहरे, इसके पीछे छिप जाते हैं


Thursday, 2 June 2011

शून्य से शून्य तक



मिल के तुमसे मुझे ग़र  बिछड़ना ही था 
तो  हुई तुमसे मेरी मुलाक़ात क्यूँ

रस्में क़समें  तो मैंने निभाईं थी सब
तब गए छोड़ कर तुम मेरा साथ  क्यूँ

मैं न बोला ,न रोया न शिकवा  कोई
मेरे बारे में इतनी हुई बात क्यूँ


उम्र भर भींचता वो रहा मुठ्ठियाँ
वक्ते आख़िर  थे उसके खुले हाथ क्यूँ

शून्य से शून्य तक का सफ़र ज़िन्दगी
फिर भला इस पे इतने सवालात क्यूँ