Thursday, 16 January 2014

तुम्हारे साथ नज़र आउंगा

मैंने तो खुद नहीं देखे सपने
फिर भला तुमको क्या दिखाऊंगा
करोगे जब भी कुछ वतन के लिए
तुम्हारे साथ नज़र आउंगा

कौन बच पाया है इस दुनिया में
दोनों मरते हैं मक़तूल भी क़ातिल भी
करोगे जब भी कुछ अमन के लिए
तुम्हारे साथ नज़र आउंगा

खिलते इन फूलों का मज़हब है क्या
देती है नूर इनको बहती हवा
करोगे जब भी कुछ चमन के लिए
तुम्हारे साथ नज़र आउंगा

Tuesday, 14 January 2014

फिर उन्ही राहों पे मुड़ना होगा

वक़्त कहता है कि उड़ना होगा
मिले थे तुमसे, बिछुड़ना होगा

बहुत सताएगी तन्हाई हमें
तुम्हारी यादों से जुड़ना होगा

दूर तक कोई भी हमदम न मिले
फिर उन्ही राहों पे मुड़ना होगा

भूल बैठे थे जो क़द झूमती हवाओं में
उन्ही पंखों को सिकुड़ना होगा

Monday, 23 December 2013

मैं विश्वविद्यालय को वर्गों में नहीं आंकता

सभी विद्यार्थियों , अध्यापक तथा समाज के और लोगों के विचार सुनने के बाद मैं अपना आकलन बताना चाहूंगा । मैं ग़लत भी हो सकता हूँ ।
" मैं विश्वविद्यालय को वर्गों में नहीं आंकता । विद्यार्थी अच्छे भी होते हैं , बुरे भी होते हैं ,अध्यापक अच्छे भी होते हैं , बुरे भी होते हैं। जे के इंस्टिट्यूट में जो हुआ वह बहुत दुखद है । विश्वविद्यालय प्रशासन ने विद्यार्थियों के प्रदर्शन के बावजूद इसकी गभीरता को नहीं समझा या समझ कर नहीं समझा । उपकुलपति महोदय , जिन्होंने अपनी वीर गाथाएं सुना सुना कर हमारे कान पका दिए , अध्यापक और विद्यार्थी को अछूत समझते हैं । अध्यापक संघ की मीटिंग में आना उन्हें गवारा नहीं । दस विद्यार्थियों से वार्तालाप नहीं कर सकते हैं । एक अध्यापक जो विज्ञान के नाम पर कोढ़ है पर जिसका यू जी सी और डी एस टी में ज़ोर है उसकी परिस्थिति सम्भालने के लिए वे बिना आमंत्रण के भी विभाग में आ सकते हैं । ईश्वर जाने इस विश्वविद्यालय का क्या होगा और यह वक्तव्य देने के बाद मेरे साथ क्या होगा ,नहीं मालूम ।

दुष्यंत की पंक्तियाँ याद आतीं हैं
" हम बहुत कुछ सोचतें हैं पर कभी कहते नहीं"

Sunday, 22 December 2013

विकलांग केंद्र

मैं सन १९७१ से डा अमर नाथ झा छात्रावास के सांस्कृतिक समारोह के लिए कव्वालियों के लिए संगीत रचना करता आ रहा हूँ । मुझे यह विधा इस लिए पसंद है कि इसमें ग़ज़ल , नज़्म , कविता और लोकगीत किसी का भी सहारा ले कर आप अपनी बात कह सकते हैं । कई वर्ष पहले उदीशा की कव्वाली प्रतियोगिता में हम लोगों को पारितोषिक धन राशि के रूप में मिला , संभवतया ५०० रु । १५ वर्ष पहले यह धन राशि काफी होती थी । वह उदीशा विकलांगो को समर्पित की गयी थी । बात यह उठी कि इस पैसे क्या किया जाय , किसी होटल में चल के खाना खाया जाय... । पर मेरे कहने पर कि यह धन राशि किसी अच्छे कार्य में लगाईं जाय , हम लोग भारद्वाज आश्रम पर गए और यह पैसा वहाँ के विकलांग केंद्र के संचालक महोदय को दिया । कोई बंगाली बुज़ुर्ग थे , मुझे नाम याद नहीं आ रहा है । उन्होंने सभी विकलांग बच्चों को एकत्रित किया और "हम होंगे कामयाब " गाना गवाया । मेरे आंसू रोके नहीं रुक रहे थे और सोच रहा था कि ईश्वर तू मुझे भी ऐसा ही बना देता तो मैं तेरा क्या बिगाड़ लेता ।

Wednesday, 18 December 2013

यहाँ बंजर ज़मीनें हैं....

न उगना  भूल  से भी ऐ गुलो  तुम इस गुलिस्तां में
यहाँ बंजर ज़मीनें हैं यहाँ बारिश नहीं होती

परिंदे भी बनाते हैं यहाँ घर आसमानों में
ज़मी पर चल सकें  पैरों में  वो ताकत  नहीं होती

झुकाये  हैं जिन्होंने सदियों तक गैरों के आगे सर 
उन्हें  सच बोलने की सच में ही आदत नहीं होती

कि जिस रब को हम सबने ही सरे बाज़ार बेचा है
दुआ मांगू उसी से अब मेरी हिम्मत नहीं होती 

Monday, 18 November 2013

बड़ा पाप.....

यदि आपके ऊपर कोई आश्रित नही है और आप एकांत में थोड़ी बहुत शराब पीते हैं , यह ग़लत तो है परन्तु बहुत बड़ा पाप नहीं है , क्यूंकि इससे आप केवल अपनी ही हानि करते हैं , किसी और की नहीं । दूसरी परिस्थिति वह है जिसमें आप के ऊपर एक परिवार आश्रित है , आपके पीने से आपका अपना स्वस्थ्य तो जाएगा ही , घर का आर्थिक संतुलन बिगड़ेगा , संतान पर बुरा प्रभाव पड़ेगा । यह बहुत बड़ा पाप है ।
आप बीती सुनाता हूँ । छात्रावासीय अंतिम वर्षों में मैंने थोडा बहुत पीना प्रारम्भ कर दिया था , कारण अनेक थे जिनको यहाँ पर लिखना सम्भव नहीं है । तीसरे चौथे दिन कुछ न कुछ हो जाती थी और यह क़रीब चार पांच वर्षों तक चलता रहा । नवम्बर १९७७ में मेरा विवाह तय हुआ , मैंने सोचा कि यदि मैं इस रास्ते पर चलता रहा तो मेरे परिवार का क्या होगा ? शादी हुई नहीं थी , होनी थी । मेरे ऊपर कोई दवाब नहीं था , किसी ने कोई सलाह नहीं दी। एक शाम को तय किया कि अब नहीं …। मेरा ईश्वर और परिवार गवाह है कि तब से आज ३५ वर्ष हो गए , मैंने शराब तो क्या मीठा पान भी नहीं खाया । मेरी माँ मुझे एक वर्ष का छोड़ कर स्वर्ग सिधार गयी थीं , बुज़ुर्ग बताते हैं , वे एक बहुत ही सरल ह्रदय की महिला थीं । संभवतया उन्ही के आशीर्वाद के फलस्वरूप मुझे यह प्रेरणा मिली और मैं एक बड़े पाप से बच गया ।
वैसे यदि आप अकेले भी हैं तो इस लत से बचिए क्यूंकि इसके प्रयोग से हानि छोड़ और कुछ नहीं होता ।

Thursday, 14 November 2013

प्यार हो जाएगा डर लगता है


बेपर्दा न आ   तसव्वुर में मेरे
प्यार हो जाएगा डर लगता है

सुबह की धूप है  चेहरा तेरा
ये सच नहीं है मगर लगता है

मिल गये   तुम नसीब है मेरा
ये दुआओं का असर लगता है

किस मक़ाम  पे ले आयी  उमर
हर एक दर्द अब तो  दर्दे जिगर लगता है