म्योर के वे दिन .......(11)
1968 में
आल इंडिया रेडियों पर मेंडोलिन की एक धुन सुनने के बाद मन में इच्छा जागृत
हुई कि काश ! मैं इस वाद्य को बजा सकता । बिना सोचे समझे चौक की एक
वाद्यों की एक दुकान 'स्वर मंदिर' जाकर एक मैन्डोलिन खरीद ली । प्रारंभ में
तो कुछ भी करते नहीं बना , पर मैंने साहस नहीं छोड़ा । विश्वविद्यालय की
छुट्टियां होतीं थी तब बाकी छात्रावासी तो घर चले जाते थे पर क्यूंकि मैं
रिसर्च कर रहा था , मुझे तो छात्रावास में
ही रहना पड़ता था । बरामदों की सीढ़ियों पर बैठे बैठे , आसमान में बादलों के
रंग बदलते देखता रहता था और अपनी उंगलियाँ चलाता रहता था । विश्वास कीजिये
, बाएं हाथ की उँगलियों के ऊपरी हिस्से चोटिल हो जाते थे । मुझे संगीत से
प्यार था और प्यार में दर्द की कोई हैसियत नहीं होती । ईश्वर का आशीर्वाद
मिला , उंगलियाँ अभ्यस्त होने लगीं और 1971 तक मैं ठीक ठाक मैन्डोलिन बजाने
लगा ।
दिसंबर के आसपास इच्छा हुई कि क्यूँ न एक
कव्वाली की धुन बनायी जाय और उसे सोशल फंक्शन में पेश किया । यूँ ही शब्द
लिख लिए " कर के उनसे उम्मीदे करम , टूटे हैं अपने सारे भरम "। उसी वर्ष
नवागंतुकों में एक विद्यार्थी प्रदीप कुमार बहुत अच्छा गाता था । सच कहिये
तो उतना सुरीला गाने वाला उसके बाद कभी कोई छात्रावास में नहीं आया । मैंने
उसको धुन सिखाई , और कुछ और साथियों को लेकर रिहर्सल प्रारम्भ कर दिए ।
कुछ लोगों ने प्रारम्भ में हतोत्साहित भी किया कि " इसमें वो बात नहीं है
"। मैंने हिम्मत नहीं छोडी और उनकी कही गयी " वो बात " ढूँढने लगा । बीच
बीच में ग़ालिब के शेर डाले और अंततः कव्वाली स्टेज हुई । ढोलक और हारमोनियम
पर रेडियो के कलाकार तथा मैन्डोलिन पर मैं स्वयं था । लोगों ने सुना तो
उछल पड़े । ज़बरदस्त तारीफ हुई ।
मेरे लिए ये एक
नए युग की शुरुआत थी । तब से आज के दिन तक छात्रावास के सोशल फंक्शन का यह
अपरिहार्य अंग बन गयी । अब तक अनेकों कव्वालियों की धुनें बना कर उन्हें
छात्रावास के मंच पर पेश किया हैं । अधिकतर सूफी अंग रहता है , कभी भी एक
भी सस्ता शेर कव्वाली का हिस्सा नहीं बना और यह सिलसिला अभी तक जारी है ।
मुख्य गायकों में प्रदीप कुमार , दिनेश गोस्वामी , देवराज त्रिपाठी ,
गिरिजेश सिंह , अनूप सिंह ,उदयन और अवनीश सिंह के नाम उल्लेखनीय हैं ।