Wednesday, 8 February 2012

एक और लमहा गुज़रा है

अभी एक और लमहा गुज़रा है 
उम्र बढ़ी या घटी क्या मालूम
पीते रहे हम तेरी यादों की शराब
जाने कब आँख लगी क्या मालूम
शब ये सो कर भी तो कट  सकती थी
फिर क्यूँ रो रो के कटी क्या मालूम   
थे इतने लोग फिर भी  दौलते ईमान   
क्यूँ  सरे बाज़ार लुटी क्या मालूम

Tuesday, 7 February 2012

बहुत कम रोशनी बाक़ी है

बहुत कम रोशनी बाक़ी है इन जलते चराग़ों में
मिलेगा अब तुम्हे भी क्या बुझी शम्मा बुझाने से

मैं एक टूटा हुआ शीशा मेरी क़ीमत ही अब क्या है
तुम्हे तक़लीफ़ ही होगी मेरी बोली लगाने से

तुम्हे झूठे बहानों से है पहले से शनासाई
मेरी बस्ती में भी आओ किसी झूठे बहाने से

इजाज़त है तुम्हे दिल में मेरे नश्तर चुभाने की
अगर मैं भी करूँ ऐसा तो मत कहना ज़माने से

उसे मालूम है राहे वफ़ा में मौत मिलती हैं
क्यूँ  चलता है इन राहों पे ये पूछो एक दीवाने से

 

Monday, 6 February 2012

क्यूँ मुझको शराबी नाम दिया

थे पहले से ही ज़ख्म कई , फिर तेरी नज़र ने काम किया
कुछ तो हम भी दीवाने थे, कुछ तुमने भी बदनाम किया

जो पीकर रोज़ बहकते थे , वो रौनक़े महफ़िल बनते रहे
मैंने तो पिये थे अश्क तेरे , क्यूँ मुझको शराबी नाम दिया

बहता हुआ पानी बनकर


तेरे चेहरे पे सुरूर आया जवानी बन कर
सिर्फ रह जायगा एक दिन ये कहानी बन कर

उम्र होती है  घटाओं की बस बरसने तक
वो भी खो जातीं हैं बहता हुआ पानी बनकर


अपने होठों को बनाए रख अभी थोड़ा शीरीं
तुझे भी बिकना है कल चीज़ पुरानी बन कर
कहीं नासूर न बन जाएँ ज़ख्म मेरे माज़ी  के
आ तसव्वुर में मेरे रात की रानी बन कर   


दिल के वीराने में ये शब न उतर जाय कहीं
समा जा सीने में एक शाम सुहानी बन कर

Friday, 3 February 2012

दो क़दम तो चलो


ये आग मैंने ही अपने लिए जलाई है
मैं नहीं कहता कि आओ और तुम भी जलो

रोज़ चलता हूँ कई गाँव तुम्हारी ख़ातिर
कमसकम साथ मेरे भी दो क़दम तो चलो 
सहर की धूप  को आने दो इन दरीचों से
यूँ न हो शाम चली जाय तो फिर हाथ मलो
न देखो उसको ये आईना तुम्हे डरायेगा
ढलती है उम्र तो ढलने दो मगर तुम न ढलो   
 

Thursday, 2 February 2012

महफ़ूज़ है क़श्ती

मुझे दे दो तुम अपने सारे ग़म
जगह बड़ी  है इस नाज़ुक दिल में

खुशियों में याद तुम करो न करो
देना आवाज़ जब हो मुश्किल  में


बड़ा सुकून है ऐ दोस्त चलते रहने में
नहीं मिलता है जो  कभी  मंज़िल में
 
अब तो साग़र में ही महफ़ूज़  है क़श्ती
दरारें आज इतनी पड़ गयी हैं साहिल में

Wednesday, 1 February 2012

नज़र हसीन बना

अपना क़द ऊँचा कर , ये ज़मीं घूमती दिखेगी तुझे
नज़र हसीन बना , सारी दुनियां हसीं लगेगी तुझे

दहशत का नया चेहरा ले के आयी है ये काली रात
तू लड़ अंधेरों से , एक दिन रौशनी मिलेगी तुझे

बड़े ज़ालिम हैं ,तेरे साथ में चलते वहशी साये
न देख मुड़ के  , तेरी परछाईं लूट लेगी तुझे