Monday, 26 December 2011
Sunday, 25 December 2011
आयेगी कब बहार
होता है शर्मसार क्यूँ ग़र प्यार किया है
चलता है ज़माना भी इसी प्यार के दम से
मुड़ के न देख पीछे बहुत दूर है मंज़िल
तय होगा फासला न तेरे चार क़दम से
उजड़े हुए चमन में आयेगी कब बहार
आ कर के पूछती है सबा रोज़ ये हमसे
थे लोग बहुत फिर क्यूँ नज़र तुझ पे जा रुकी
शायद है कोई रिश्ता मेरा पिछले जनम से
चलता है ज़माना भी इसी प्यार के दम से
मुड़ के न देख पीछे बहुत दूर है मंज़िल
तय होगा फासला न तेरे चार क़दम से
उजड़े हुए चमन में आयेगी कब बहार
आ कर के पूछती है सबा रोज़ ये हमसे
थे लोग बहुत फिर क्यूँ नज़र तुझ पे जा रुकी
शायद है कोई रिश्ता मेरा पिछले जनम से
Saturday, 24 December 2011
बहकते हैं क़दम
नहीं मिलती हैं मंजिलें अक्सर
उलझी राहों में बहकते हैं क़दम
दिन है तो साथ हैं हज़ारों का
डूबती शाम कितने तनहा हम
मुझको बस इतनी इजाज़त दे दे
तेरे ज़ख्मों पे रख सकूँ मरहम
साथ बस कुछ ही दौलतें हैं मेरी
एक तेरा ग़म और ज़माने के सितम
हमने देखी है यारब तेरी दरियादिली
ज़िन्दगी दी भी तो वो इतनी कम
Friday, 23 December 2011
तू मेरे साथ चले न चले
हमें तो बंदगी की आदत है
तेरी मर्ज़ी सलाम ले या न ले
मेरा चलना बहुत ज़रूरी है
तू मेरे साथ चले न चले
हँसता चेहरा लगा के जीते हैं
जिनके सीने में कई दर्द पले
टूटे शीशों से हाथ कटते हैं
क्यूँ भला उनका ख़रीदार मिले
ये काली रात बहुत लम्बी है
कोई चराग़ कितनी देर जले
Wednesday, 21 December 2011
शब बहुत अँधेरी थी
यूँ समझिये कि ख़ुदकुशी कर ली
कटे थे पंख हवाओं से दोस्ती कर ली
न थे चराग़ और शब बहुत अँधेरी थी
दिल जलाकर के रोशनी कर ली
इस तरफ आते हैं वो लौट कर नहीं जाते
ये है बदनाम मोहब्बत की गली
उतर के आयी तेरे गेसुओं से सांवली शाम
लजाती धूप पी के घर को चली
Wednesday, 7 December 2011
दे अब्र या ज़हर दे
तेरे दर को चूम लेंगे , मालिक ऐ दो जहाँ
भूखों का पेट भर दे , रहने को एक घर दे
कितनों के लिए सिर्फ एक छत है आसमान
उघड़े हुए बदन को एक छोटी सी चादर दे
घर की कुआरी बेटी के हाथ पीले कर दे
माँ बहन की कलाई , हरी चूड़ियों से भर दे
बस इतना मांगते हैं , अहले चमन ये तुझसे
इतने दिए हैं कांटे , कुछ गुल भी तो इधर दे
सागर ने रूह कर दी है, अब तेरे हवाले
मर्ज़ी है तेरी बादल , दे अब्र या ज़हर दे
Thursday, 1 December 2011
वो रात ज़लज़ले की
अब जिल्द चढ़ चुकी है क़िताबे ज़िंदगी पे
हम पीछे देखते हैं पन्ने पलट पलट के
दरिया ने कहाँ रोका था मिलने के रास्तों को
क्यूँ मिल न सके हम तुम जब दोनों एक तरफ़ थे
तुम मुझ पे लगाते हो तोहमत क्यूँ सरे महफ़िल
क्या मैं ही सब ग़लत था या तुम भी कुछ ग़लत थे
थी इंतिहा ऐ उल्फ़त वो रात ज़लज़ले की
सब लोग मर चुके हैं हम इससे बेख़बर थे
मत छेड़ अब तू मुझसे मेरी दास्ताने माज़ी
आ आ के सतायेंगे वो क़िस्से उम्र भर के
थोड़ी सी और मोहलत यारब मुझे भी दे दे
करते हैं प्यार मुझसे कुछ लोग इस शहर के
Subscribe to:
Posts (Atom)