Tuesday, 22 November 2011

नयनों का खारा जल

पाहन बैठे हैं आस लगा , पूछा करते हैं पल प्रति पल
कब अधर हमारे भीगेंगे , नदिया कहती जाती 'कल कल'

क्या करें शिकायत हम तुमसे आवारा सर्द हवाओं की
हमने तो हाथ बढ़ाये थे , ले गयीं छीन तेरा आँचल
 
है शिल्पकार अन्याय तेरा , जीवन में गहरे घाव दिए
फिर उनकी पीड़ा सहने को , क्यूँ हृदय दिया इतना कोमल

मैं रूप तुम्हारा क्यों देखूं , मैं अपनी प्यास बुझा लूँगा
मेरे प्याले में भर देना अपने नयनों का खारा जल

कल ये होगा कल वो होगा , यदि ये न हुआ तो क्या होगा
मत इतना गणित लगाओ तुम, कुल जीवन है केवल दो पल
 

Monday, 21 November 2011

वो पहली मुलाक़ात

कुछ  लोग सोचते थे  उनसे जहान है 
ना जाने कहाँ खो गए मालूम नहीं
जिनके भी हक़ में आया है ये रैन बसेरा
क्यूँ सब दीवाने हो गए मालूम नहीं 

बादल तो आये थे बिना बरसे चले गए
पलकों को कब भिगो गए मालूम नहीं

भूखी ज़मीन रात भर जगती है किस लिए
जब आसमान सो गए  मालूम नहीं
वो पहली मुलाक़ात मुझे याद है मगर
हम कब तुम्हारे हो गए मालूम नहीं
 
 

Saturday, 19 November 2011

गुलशन अभी बर्बाद नहीं


जब तक खुली हैं आँख तभी तक है ज़माना
गर मैं नहीं तो कुछ भी मेरे बाद नहीं है
बीता हुआ सफ़र है  एक ख्व़ाब की तरह
जो भी है याद ठीक से कुछ याद नहीं है
ख़ारों की क़तारों में हैं पोशीदा कुछ गुलाब
गर्दिश में है गुलशन अभी बर्बाद नहीं है
सदियों से यहाँ लोग तो आयें  हैं  मुसलसल
फिर भी न जाने क्यूँ ये घर आबाद नहीं है

अपनी हद में ही तैर  प्यार के समंदर में
कितना गहरा है कहाँ तुझको ये अंदाज़ नहीं है


 


 






Friday, 18 November 2011

सभी राज़ ले गए

वो मांगते हैं वापस  अपनी  अमानतें
कुछ पहले ले गए थे कुछ आज ले गए
जब से चलीं चमन में ये खुश्क हवाएं
पत्ते उड़े शाखों के सभी राज़ ले गए

मैं किस तरह पुकारता जाते हुए उन्हें
रुखसत हुए तो शिद्दते आवाज़ ले गए
नादान  था बचा न सका राज़ों की दौलत
जितने थे राज़ दिल में वो हमराज़ ले गए




Thursday, 17 November 2011

बुरी है रोशनी भी

क्यूँ है इलज़ाम हवा पे कि वो बहती क्यूँ है
यहाँ हर कोई बहता है समय भी आदमी भी

पर्दा गिरता है एक मुख़्तसर किरदार के बाद
यहाँ हर चीज़ बुझती है शमा भी ज़िंदगी भी

जो है हर वक़्त रूबरू उसकी क़ीमत क्या है
चला जाये कोई आके तो खलती है कमी भी

ज़रूरत है चराग़ों की अगर घर में अँधेरा है
जो सोने भी न दे हमको बुरी है रोशनी भी

फ़र्क़ कुछ तो रहे पत्थर में और एक आदमी में
बची रहने दे इन आँखों में थोड़ी सी नमी भी

मेरा हक़ ही नहीं है चाहने की आरज़ू पर
ये है जो प्यार मेरा है मेरी एक बेबसी भी

 
 

Wednesday, 16 November 2011

शब की तारीकी

बाद मुद्दत के मिला तेरा दर
अब ये कहते हो लौट जाएँ हम

ग़म छिपाना हमें नहीं आता
न करो ज़िद कि मुस्कुराएँ हम

और हर बात मान लूँगा मै
मत कहो तुमको भूल जाएं हम
बढ़ती जाती है शब की तारीकी
कितना अब और दिल जलाएं हम
कोई भूले से भी अपना न हुआ
और अब किसको आज़माएँ हम

जी चुके उम्र तेरी दुनियां में
अब कहाँ आशियाँ बनाएं हम 

 
 

Monday, 14 November 2011

इस बहते पानी में

छिपी है दास्ताँ दुनिया से , पर ये भी हक़ीक़त है
मेरी बरबादियों का ज़िक्र है तेरी कहानी में

न जाने लोग कितने रंग चेहरों पर लगाते हैं
सभी घुल घुल के बह जाते हैं उल्फत की रवानी में

ज़रा रफ़्तार कम कर ले तू इन अश्क़ों के दरिया की
नज़र आती नहीं  सूरत तेरी इस  बहते पानी में

हम मांगे  किस तरह तुमसे  कोई एक और नया तोहफ़ा

कि तुमने ग़म दिए इतने मोहब्बत की निशानी में