Saturday, 22 August 2015

यहाँ दैरो हरम लड़ते हैं

ग़ुलों के साथ कांटे हैं हवाएँ गर्म बहती हैं
न जाने फिर भी क्यूँ हमसे चमन छोड़ा नहीं जाता

यहाँ दैरो हरम लड़ते हैं अपनी रूह घुटती है
मगर हम हैं कि हमसे ये वतन छोड़ा नहीं जाता

ऐ याराँ कितने हैं दिलकश नज़ारे और दुनियां में
कहाँ जाएँ कि अब तेरा सहन छोड़ा नहीं जाता

ज़माना रोज़ कहता है जवाँ अब हो गया है वो
मगर उस बेख़बर से बालपन छोड़ा नहीं जाता

Wednesday, 22 July 2015

पूछ लेना तेरा मज़हब क्या है

जब भी जाए इस वतन की हवा साँसों में
पूछ लेना तेरा मज़हब क्या है
गर जो काफ़िर वो निकल जाए कहीं
हो जो हिम्मत उसे लौटा देना

Thursday, 16 July 2015

डर लगता है

बारहा यूँ न आ तसव्वुर में
प्यार हो जाएगा डर लगता है

सुबह की धूप जैसा चेहरा तेरा
ये सच नहीं है मगर लगता है

इश्क़ के ज़ख्म तो भर जाते है
दर्द क्यूँ सारी उमर लगता है

लोग रोते हैं यहां शामो सहर
फिर भी खामोश शहर लगता है

Tuesday, 17 February 2015

कौन सा

किसके लिए रोया था रात पूछती है सबा
कौन सा रिश्ता था तुझसे जो बता देता

Monday, 12 January 2015

दर्द का उन्वान हूँ मैं

नग़मा ए दर्द का उन्वान हूँ मैं
वक़्त से जूझता इंसान हूँ मैं

जिसने देखा उठा के चलता बना
घर से फेंका हुआ सामान हूँ मैं

ज़िंदा रहने दे मुझे पैकरे हुस्न
मैं इश्क़ हूँ कि तेरी शान हूँ मैं

मुझको सीने से लगाले हमदम
तेरा साया तेरा ईमान हूँ मैं

Monday, 6 October 2014

लोग कह कर मरा नहीं करते

रोज़ कहते हो कि मर जायेंगे
लोग कह कर मरा नहीं करते

मैं बुरा हूँ तो रब से मेरे लिए
मौत की क्यूँ दुआ नहीं करते

आदमी खुद को दफ्न करता है
हादिसे यूँ हुआ नहीं करते

न भर तू आह, सुलगती है आग
जलते दिल को हवा नहीं करते

Sunday, 14 September 2014

नाम तेरा कब कम हो जाए

पास है जो भी कब खो जाए
जन्नत कब दोज़ख हो जाए
खुशियाँ सब ओझल हो जाएँ
दर्द भरा आलम हो जाए
खुश्क हवाओं के मौसम में
आँख तेरी कब नम हो जाए
खुद जी और जीने दे सबको
किसे खबर है अगले पल की
ज़िंदा लोगों की सूची में
नाम तेरा कब कम हो जाए