Sunday, 22 April 2012

ये रंगे हिना


कौन जाएगा यहाँ से  और कौन आएगा 
होता है ये हम सब की  इजाज़त के बिना

मरने  वालों ने आगाह किया है फिर भी
कौन जी पाया ज़माने में मोहब्बत के बिना
न मिट सकेंगे मेरे दिल पे निशां चोटों के
तेरे हाथों से उतर  जाएगा ये रंगे हिना

तूने तो रखा  होगा अपने तीरों का हिसाब
न मैंने  वार  गिने और नहीं ज़ख्मों को गिना

दुआओं की तरह


चमन में खेलती इठलाती हवाओं की तरह
घरों में बेटियां आतीं हैं दुआओं की तरह

मैंने एक नाम पुकारा था कभी सावन में
मन के आँगन में बरसता है घटाओं की तरह

इलाज जिसका कोई कर सके न चारा गर
दो मीठे बोल असर करते दवाओं की तरह

प्यार के नग़में सुनाता हूँ पर्वतों को मैं
गूंजते हैं मेरे कानों में सदाओं की तरह

Wednesday, 18 April 2012

बच के रहिएगा शमाओं से


बच के रहिएगा शमाओं से तो अच्छा होगा
आग लग जाती  है तिनकों के घर में

कहीं से ढूंढ के रक्खो तुम एक अपना क़ातिल
अब अपनी मौत से मरता नहीं कोई शहर में


अपनी  बाहों में छिपा ले ऐ आसमां इसको 
ज़मीं महफ़ूज़  नहीं अपने ही दीवारो दर में 


मत गिनो उनको जो देहलीज़ पे जलते हैं चराग़
न जाने कौन सा बुझ जाए आज रात भर में

Monday, 16 April 2012

आँख लगी है अभी

ये मानता हूँ निकल आया सलोना सूरज
उसे सोने दो उसकी आँख लगी है अभी

मिला है वक़्त अभी और जीते रहने का
तू मिलेगा ये तमन्ना नहीं मरी है अभी
है फ़िक्र उनको कि घर में अभी अँधेरा है
इन चराग़ों में थोड़ी सी रोशनी है अभी

उस परी पैकर के तसव्वुर में मुझे रहने दो
खो गया चाँद मगर दिल में चांदनी है अभी

Tuesday, 10 April 2012

काँटों की हिमाक़त

कैसे बयान हो मेरी रूदादे मोहब्बत
डर है कि न मिट जाए कहीं तेरी ये शोहरत

प्यार होगा कोई एक खेल तेरी दुनिया में
समझा है इसे मैंने उस रब की इबादत

कह सकते हो तुम हाँ कोई दीवाना था
मैंने तो इसकी उम्र भर दी है बड़ी क़ीमत

नादाँ हैं चले आते हैं चुनने को यहाँ फूल
उनको नहीं मालूम है काँटों की हिमाक़त

गुनहगार नहीं हो

यूँ  इस तरह  न छिपाओ  चेहरा
खूबसूरत हो,  गुनहगार नहीं हो

कैसे समझाएं अहले दुनियाँ  को
बाज़ार में आये हो , बाज़ार नहीं हो

कोई नहीं बचा है अब शरीफ़ शहर में
एक तुम हो, मानने को तैयार नहीं हो

दर्दे निहाँ से मर गया वो चीखता रहा
और लोग ये कहते रहे बीमार नहीं हो

पिलाई इस क़दर तूने

पिलाई इस क़दर तूने ऐ ज़िंदगी हमको
रगों में खून नहीं अब शराब बहती है

हवा को जितना जला देता है दिन में सूरज
रात भर उसकी तपिश सारी ज़मीं सहती है

एक दिन होगा धुंआ ये तेरा भी शोख़ बदन
ये मैं नहीं ये तेरी ढलती उम्र कहती है