Monday, 6 February 2012

बहता हुआ पानी बनकर


तेरे चेहरे पे सुरूर आया जवानी बन कर
सिर्फ रह जायगा एक दिन ये कहानी बन कर

उम्र होती है  घटाओं की बस बरसने तक
वो भी खो जातीं हैं बहता हुआ पानी बनकर


अपने होठों को बनाए रख अभी थोड़ा शीरीं
तुझे भी बिकना है कल चीज़ पुरानी बन कर
कहीं नासूर न बन जाएँ ज़ख्म मेरे माज़ी  के
आ तसव्वुर में मेरे रात की रानी बन कर   


दिल के वीराने में ये शब न उतर जाय कहीं
समा जा सीने में एक शाम सुहानी बन कर

Friday, 3 February 2012

दो क़दम तो चलो


ये आग मैंने ही अपने लिए जलाई है
मैं नहीं कहता कि आओ और तुम भी जलो

रोज़ चलता हूँ कई गाँव तुम्हारी ख़ातिर
कमसकम साथ मेरे भी दो क़दम तो चलो 
सहर की धूप  को आने दो इन दरीचों से
यूँ न हो शाम चली जाय तो फिर हाथ मलो
न देखो उसको ये आईना तुम्हे डरायेगा
ढलती है उम्र तो ढलने दो मगर तुम न ढलो   
 

Thursday, 2 February 2012

महफ़ूज़ है क़श्ती

मुझे दे दो तुम अपने सारे ग़म
जगह बड़ी  है इस नाज़ुक दिल में

खुशियों में याद तुम करो न करो
देना आवाज़ जब हो मुश्किल  में


बड़ा सुकून है ऐ दोस्त चलते रहने में
नहीं मिलता है जो  कभी  मंज़िल में
 
अब तो साग़र में ही महफ़ूज़  है क़श्ती
दरारें आज इतनी पड़ गयी हैं साहिल में

Wednesday, 1 February 2012

नज़र हसीन बना

अपना क़द ऊँचा कर , ये ज़मीं घूमती दिखेगी तुझे
नज़र हसीन बना , सारी दुनियां हसीं लगेगी तुझे

दहशत का नया चेहरा ले के आयी है ये काली रात
तू लड़ अंधेरों से , एक दिन रौशनी मिलेगी तुझे

बड़े ज़ालिम हैं ,तेरे साथ में चलते वहशी साये
न देख मुड़ के  , तेरी परछाईं लूट लेगी तुझे

Tuesday, 31 January 2012

पूनम का चाँद

भूखा हो पेट तो पूनम का चाँद
एक रोटी की तरह दिखता है
शीशा ऐ दिल भी टूटने के बाद
सिर्फ कौड़ी के मोल बिकता है

ग़र जो बाहोश लिखूं अपना नाम
उंगलियाँ बारहा बहकती हैं
बंद आँखों से भी ये मेरा हाथ
क्यूँ तेरा नाम सही लिखता है

जब भी आया है यादों का सैलाब
रोक पाया है कहाँ साहिले दिल
भीगी पलकों से निकल कर आंसू
ख़ुश्क रुखसारों पे कब रुकता है
 

Monday, 16 January 2012

न हो मायूस ऐ मेहमाँ


न हो मायूस ऐ मेहमाँ अगर है बंद दरवाज़ा
अलग दस्तूर है उल्फ़त के इस बाज़ार का

दरीचों का ये पर्दा तो बस एक झूंठा दिखावा है
पसे  पर्दा है  कोई  मुन्तज़िर  दीदार का

नये लोगों की  उम्मीदें अलग हैं तो बुरा क्या है  
तरीक़ा तुम भी  अपना लो नया इज़हार का

जिसे तुमने दिए हैं उम्र भर बस ज़ख्म और धोखे
उसी से  पूछ्तें हो  हाल तुम उस  बीमार का  

Friday, 13 January 2012

रखना क़दम संभल के

मैं किस तरह बनाऊं तस्वीर अपने रब की
वो जब भी मिला मुझसे नयी सूरतें बदल के
अब रात ढल रही है मत भर पियाले साक़ी
हर रिंद को जाना है मयख़ाने से निकल के
हैं मेरे पैर घायल और लम्बे फासले हैं
जाना हैं तेरे दर तक काँटों पे मुझे चल के

उल्फ़त का ये  शहर है एक भूल भुलैंयाँ सा
उलझी हुई गलियों में रखना क़दम संभल के