Friday, 8 July 2011
Thursday, 7 July 2011
क्यूँ ईश्वर ढूंढे गली गली
नयनों से छलकी मदिरा की क्यूँ लगती है बरसात भली
बिन पिए मुसाफ़िर बहक गए , जब रूप की तेरे बात चली
वो रूह के अन्दर बैठा है , तेरी रग रग में शामिल है
फिर पूजा की थाली लेकर , क्यूँ ईश्वर ढूंढे गली गली
मैंने जीवन में बहुत सहा ,पर तुमसे कुछ भी नहीं कहा
मुझको भी रोना आता है ,मेरे मन में भी पीर पली
इस दिल के सख्त अंधेरों में, एक प्यार की शम्मा रहती है
मैं जलता बुझता रहा सदा ,वो हरदम मेरे साथ जली
पर मकां भी इतना न दूर हो
न राहें अपनी बदल सके ,न दिल के क़रीब ही आ सके
पर ये भी सच है कि उम्र भर, तुझे भूलकर न भुला सके
वो थकन , अधूरी सी हसरतें ,मेरे अश्क बन के बरस गयीं
सारे हर्फ़ लब पे ही रुक गए ग़म ऐ दिल उन्हें न सुना सके
तू जहाँ कहे मैं वहां रहूँ, पर मकां भी इतना न दूर हो
मैं किसी के दर पे न जा सकूँ,कोई मुझको घर न बुला सके
जाने कितनी आई है मंजिलें ,मेरी रातों की नींदें उड़ा गयीं
कोई ऐसी भी तो जगह बता , मुझे चैन से जो सुला सके
Monday, 4 July 2011
कैसी ये आराधना है ?
वो सुलगती रेत पर अक्सर अकेला ही चला है
समय बस साक्षी बना है
पहले सूली पर चढ़ा दो ,फिर उसे ईश्वर कहो तुम
पहले गोली से उड़ा दो ,बाद में पूजा करो तुम
हम सभी ने अपने उस आराध्य को मिल कर छला है
कैसी ये आराधना है ?
तेरा ग़र आना सही था तेरा जाना भी सही है
उम्र भर का जोड़ देखो कुल मिला कर शून्य ही है
दुःख क्यूँ जाएगा हृदय से वह तो बचपन से पला है
सुख को बस आना मना है
आया है जो जाएगा वो , ये प्रथा ही चलती आई
व्यर्थ है श्रंगार तेरा , होनी है एक दिन विदाई
छोड़ कर जाना है तुझको इस धरा पर जो मिला है
आईने से सामना है
वो सुलगती रेत पर.......
समय बस साक्षी बना है
पहले सूली पर चढ़ा दो ,फिर उसे ईश्वर कहो तुम
पहले गोली से उड़ा दो ,बाद में पूजा करो तुम
हम सभी ने अपने उस आराध्य को मिल कर छला है
कैसी ये आराधना है ?
तेरा ग़र आना सही था तेरा जाना भी सही है
उम्र भर का जोड़ देखो कुल मिला कर शून्य ही है
दुःख क्यूँ जाएगा हृदय से वह तो बचपन से पला है
सुख को बस आना मना है
आया है जो जाएगा वो , ये प्रथा ही चलती आई
व्यर्थ है श्रंगार तेरा , होनी है एक दिन विदाई
छोड़ कर जाना है तुझको इस धरा पर जो मिला है
आईने से सामना है
वो सुलगती रेत पर.......
Sunday, 3 July 2011
तेरी उंचाइयां ए आसमां
किस तरह पाऊं तेरी उंचाइयां ए आसमां
पंख मेरे गिर चुके हैं ,तू भी कितना दूर है
क्यूँ भला मानेंगे मेरी बात ये अहले जहाँ
उतना ही गुमनाम मैं, जितना कि तू मशहूर है
ढूंढता है तू सितार्रों में जो अपना आशियाँ
इस ज़मीं पर देख कितना आदमी मजबूर है
अजनबी ये महफ़िलें और लोग ये नाआशना
तू नहीं तो ये सफ़र अब किस क़दर बेनूर है
मेरी हर एक सांस है तेरी हवाओं पे निसार
तेरी ख़ातिर ऐ वतन मरना मुझे मंज़ूर है
फिर भी गाता हूँ राष्ट्र गीत
डूबीं सैलाब में कुछ बस्तियां तो क्या ग़म है
हाकिमे शहर का घर तो सही सलामत है
पिछले हफ्ते ही तो डाले थे निवाले तुमको
चार दिन भूखे भी रह लोगे तो क्या आफ़त है
चंद लोगों में ही बँट जाय वतन की दौलत तुम्ही समझाओ कि ये कौन सी सियासत है
कि खड़ा हो सकूँ पैरों में वो ताकत ही नहीं
फिर भी गाता हूँ राष्ट्र गीत ये मेरी हिम्मत है
मैं जो मर जाऊँगा तो फिर तू भी जियेगा कैसे
मेरी ग़ुरबत मेरी मजबूरी तेरी ताक़त है
जिस हुक़ूमत में नहीं मिलते क़फ़न मुर्दों को
मेरे बदन पे हैं कुछ कपडे बहुत ग़नीमत है
Saturday, 2 July 2011
चंद टूटे हुए मोती
चंद टूटे हुए मोती वो तेरी यादों के
ग़म के दरिया में धो लिए होते
कुछ तो कम होती सीने की जलन
हम भी औरों की तरह रो लिए होते
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