Thursday, 3 September 2015

नींद आ जाए वो नसीब कहाँ

नींद आ जाए वो नसीब कहाँ
रातें आ आ के जलातीं हैं सौतन की तरह

बहुत सताया है ज़िंदगी तुमने
जी करे है कि रूंठ जाएँ बचपन की तरह

दर्द जो हर घड़ी छलकता है
काश कि ये भी बरस जाता सावन की तरह

निकल गया  जो  मन के आँगन से
फिर नहीं लौटा  गुज़रे हुए जीवन की तरह

Friday, 28 August 2015

तुम बिना बात क्यूँ नहीं मिलते

सिर्फ मिलते हो किसी मक़सद से
तुम बिना बात क्यूँ नहीं मिलते

इतना उजड़ा है अब चमन कि यहां
मौसमी फूल भी नहीं खिलते

तसल्लियों का खज़ाना तो सभी रखते हैं
ज़ख्म दिखते हुए नहीं सिलते

वादा उसने किया था कल का हमें
आज भी रह गया मिलते मिलते

Wednesday, 26 August 2015

तूने मोहलत न दी संभलने की

हमको बर्बाद यूँ ही होना था
अपनी फितरत न थी बदलने की

न गिरते इस तरह हम तेरे दर पे ऐ साक़ी
तूने मोहलत न दी संभलने की

न कोई ज़िक्रे सुबह और न इंतज़ामे शाम
बात उठ्ठी है रात ढलने की

रिन्द गिरने लगे हैं अब तेरे मयखाने में
सोचते हम भी हैं निकलने की

Saturday, 22 August 2015

यहाँ दैरो हरम लड़ते हैं

ग़ुलों के साथ कांटे हैं हवाएँ गर्म बहती हैं
न जाने फिर भी क्यूँ हमसे चमन छोड़ा नहीं जाता

यहाँ दैरो हरम लड़ते हैं अपनी रूह घुटती है
मगर हम हैं कि हमसे ये वतन छोड़ा नहीं जाता

ऐ याराँ कितने हैं दिलकश नज़ारे और दुनियां में
कहाँ जाएँ कि अब तेरा सहन छोड़ा नहीं जाता

ज़माना रोज़ कहता है जवाँ अब हो गया है वो
मगर उस बेख़बर से बालपन छोड़ा नहीं जाता

Wednesday, 22 July 2015

पूछ लेना तेरा मज़हब क्या है

जब भी जाए इस वतन की हवा साँसों में
पूछ लेना तेरा मज़हब क्या है
गर जो काफ़िर वो निकल जाए कहीं
हो जो हिम्मत उसे लौटा देना

Thursday, 16 July 2015

डर लगता है

बारहा यूँ न आ तसव्वुर में
प्यार हो जाएगा डर लगता है

सुबह की धूप जैसा चेहरा तेरा
ये सच नहीं है मगर लगता है

इश्क़ के ज़ख्म तो भर जाते है
दर्द क्यूँ सारी उमर लगता है

लोग रोते हैं यहां शामो सहर
फिर भी खामोश शहर लगता है

Tuesday, 17 February 2015

कौन सा

किसके लिए रोया था रात पूछती है सबा
कौन सा रिश्ता था तुझसे जो बता देता